Wednesday, June 24, 2015

श्री शेरजंग गर्ग को साहित्‍य अकादेमी बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 2015



बच्‍चों के प्रिय कवि श्री शेरजंग गर्ग को साहित्‍य अकादेमी बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 2015 प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है। 
उन्‍हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाऍं। 

The official sources from the Sahitya Akademi, New Delhi, have announced that the beloved poet of Children Dr. SherJung Garg is the person who would be awarded with Sahitya Akademi Children's Literature Award 2015. Hearty Congratulations  to Dr. Garg from the World of Children's Literature Group!

डा. शेरजंग गर्ग की बाल कविताऒं पर एक विस्तृत टिप्पणी इसी ब्लोग पर 19-12-2014 की पोस्ट में आप पढ़ सकते हैं।

अन्य भाषाओं पर दिये जाने वाले साहित्य अकादमी बाल-साहित्य पुरस्कार 2015  हेतु चयनित साहित्यकारों की सूची इस प्रकार है: 








- रमेश तैलंग




Friday, June 5, 2015

बच्चों की किताबों को अभद्र शब्दावली (गाली-गलौज आदि) से मुक्त रखने की पहल




बच्चों की किताबें  अवांछित, अशालीन और अभद्र शब्दों के प्रदूषण से मुक्त रहें इसके उपाय दुनिया भर में ढूंढ़े जा रहे है। अमेरिका के एक दंपति ने तो, जो अपनी बेटी को "अभद्र शब्दों वाली किताबों से बचाना चाहते थे, इसके लिए एक "अप्लेकेशन" बना भी लिया  हैं । इस अप्लीकेशन" में शब्दों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है -"क्लीन, क्लीनर और स्क्वीकी क्लीन" लेकिन कौन सा शब्द किस श्रेणी में रखा जायेगा, यह  अभी स्पष्ट नहीं है।  निकट-भविष्य में संभव है, इसे अभिभावक स्वयं तय कर सकें।
समस्या यह है कि अभद्र शब्दावली, जिनमें गालियां भी शामिल है, का औचित्य-अनौचित्य भौगोलिक क्षेत्रों, संस्कृति तथा समय के परिवर्तन केअनुसार बदलता रहता है और इस प्रक्रिया में उत्साहवश निर्दोष शब्दों पर भी छुरी चल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस "अप्लीकेशन" के इस्तेमाल से पहले यदि बच्चों के कुछ सम- समूह किताब के  मूल पाठ को परिष्कृत होने से पहले पढ़ चुके हों तो यह सारी कवायद ही निरर्थक हो जाएगी और इस अप्लीकेशन का कम से कम उनके लिए कोई महत्व ही नहीं रहेगा।
- रमेश  तैलंग

(इन्पुट्स-साभार -एकोनोमिक्स टाइम्स)
इमेज सौजन्य -गूगल)

Saturday, February 7, 2015

हिंदी में बालसाहित्य की वर्तमान स्थिति

हिंदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद द्वारा 31-1-2015 को अकादमी के सभागार में हिंदी में बालसाहित्य की वर्तमान स्थिति पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में अकादमी के अध्यक्ष एवं साहित्यकार डा. सुनील जोगी, कार्यकारी सचिव श्री बृजेश चन्द्र, कोषाध्यक्ष डा. रविनन्दन सिंह की प्रतिभागिता के साथ डा. शेरजंग गर्ग, डा. दिविक रमेश तथा रमेश तैलंग ने वक्ता के रूप में समक्ष अपने-अपने विचार रखे। यहां प्रस्तुत है एक आलेख -






                  
हिंदी में बालसाहित्य की वर्तमान स्थिति
-         रमेश तैलंग
बीसवीं शताब्दी के अवसान के बाद इक्कीसवीं शताब्दी में  हिंदी बालसाहित्य की यह एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है कि उसकी  गूंज आज हिंदी साहित्य जगत में हर जगह सुनाई दे रही है। इस तथ्य के बावजूद कि हिंदी बालसाहित्य के समक्ष अभी भी अनेक आसन्न चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं, मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि वर्तमान में बालसाहित्य, वयस्क साहित्य के समानांतर, एक स्वतंत्र धारा के रूप में प्रवाहित हो रहा है और यदि वयस्क साहित्य के कुछ स्वनामधन्य घंटाकर्ण आलोचक अभी भी इस सच्चाई को स्वीकारने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं तो यह हिंदी बालसाहित्य का नहीं, स्वयं उनका दुर्भाग्य है। जिस भारतेन्दु युग में आधुनिक हिंदी साहित्य का उत्स दिखाई देता है उसी भारतेन्दु युग में आधुनिक हिंदी बालसाहित्य का उत्स भी मौज़ूद है। अंधेर नगरी चौपट राजा.. जैसा नाटक प्रौढ और बालसाहित्य दोनों में अनूठी रचना के रूप में स्वीकृत है..अमीर खुसरो की मुकरियों पर भी यह बात उतनी ही शिद्दत से लागू होती है....आगे महावीर प्रसाद द्विवेदी युग से चलते-चलते हिंदी (जिसे आप हिंदुस्तानी भी कहें तो मुझे कोई ऐतराज नहीं) बालसाहित्य ने बालकविता से शुरु होकर गद्य की अनेक विधाओं में अपना हस्तक्षेप करते हुए एक-डेढ़ शताब्दी की यात्रा तो संपन्न कर ही ली है जिसे हम हिंदी बालसाहित्य की परंपरा का नाम दे सकते हैं।  


 
यहां आज भले ही हम हिंदी में बालसाहित्य की वर्तमान स्थिति पर विचार करने जा रहे हैं पर यह कार्य हिंदी बालसाहित्य के विकास की परंपरा से परचे बिना नहीं किया जा सकता. हिंदी के बड़े-से बड़े लेखकों ने बालसाहित्य रचा है और उसके अतीत पर हम गर्व कर सकते हैं। हमारे अपने समय के स्मरणीय बालसाहित्यकारों में प्रेमचंद, श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिनकर, महादेवी वर्मा, सुमित्रा कुमारी सिन्हा, जहूर बख्श, रामनरेश त्रिपाठी मन्नन द्विवेदी, सोहनलाल द्विवेदी, निरंकार देव सेवक, शकुंतला सिरोठिया, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी अमृतलाल नागर, मस्तराम कपूर, डा0 श्री प्रसाद से ले कर डा0 हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारतीडा0 राष्ट्रबंधु, शंकर सुल्तानपुरी, प्रकाश मनु, देवेंद्र कुमार, दिविक रमेश, विनायक, हरिकृष्ण तैलंग, हसन जमाल, रोहिताश्व अस्थाना, शंकर सुलतानपुरी, संजीव जायसवाल संजय, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, सुरेंद्र विक्रम, उषा यादव, क्षमा शर्मा, पंकज चतुर्वेदी, जाकिर अली रजनीश, मोहम्मद साजिद खान, मो. अरशद खान, आदि युवा एवं वरिष्ठ बालसाहित्यकारों की लंबी पांत है जिनकी पूरी सूची दी जाए, तो ऐसे कई आलेख सैंकड़ों पृष्ठों में भी नहीं समा सकेंगे।
यहां यह बात स्मरण रखने योग्य है कि शिक्षा और बालसाहित्य दोनों एक दूसरे पर परस्पररूप से निर्भर है। भारत की आशा उसकी नई पीढ़ी पर ही टिकी है और नई पीढ़ी को यदि यांत्रिकता और संवेदनहीनता से बचाए रखना है तो न केवल श्रेष्ठ बालसाहित्य को उसके जीवन का अंग बनाना होगा बल्कि इसके लिए, प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च्तर शिक्षा तक के ढांचे में भी वांछित परिवर्तन लाना होगा।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राथमिक तथा माध्यमिक शिक्षा में बालसाहित्य अभी भी पाठ्यपुस्तकों की परिधि को नहीं लांघ सका है। उच्च्तर शिक्षा के क्षेत्र में भारत के विभिन्न विश्वविद्यालय हिंदी बालसाहित्य के विविध पक्षों और बालसाहित्यकारों के महत्वपूर्ण अवदान पर शोध करने वाले विद्यार्थियों को पी.एचडी और डी.लिट की शताधिक उपाधियां प्रदान कर चुके हैं, अनेक शोध प्रबंध प्रकाशित भी हो चुके है, फ़िर भी स्नातकीय तथा परास्नातय उपाधि हेतु बालसाहित्य को स्वतन्त्र विषय के रूप में स्वीकृत होने के लिए  आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। इस संबंध में मैने जनसत्ता के चौपाल स्तम्भ में गत 1 जनवरी को एक टिप्पणी लिख कर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया था जिसमें यह रेखांकित किया था कम से कम 15-20 विदेशी विश्वविद्यालय अंग्रेजी भाषा में स्नात्कोत्तर तथा परास्नातक उपाधि के लिये बालसाहित्य के पाठ्यक्रम चला रहे हैं पर भारतीय विश्वविद्यालयों में अभी इसकी शुरुआत भी नहीं है। 
 हिंदी की नामी-गिरामी पत्रिकाएं जिनमें, आजकल, मधुमती, साक्षात्कार, अभिनव इमरोज, साहित्य अमृत, नवनीत, द्वीप लहरी, कथा,  आदि प्रमुख हैं,  हर वर्ष बालसाहित्य पर केंद्रित विशेषांक निकाल रही हैं। देश के प्रतिष्ठित हिंदी सेवी संस्थान हिंदी बालसाहित्य पर न केवल महत्वपूर्ण संगोष्ठियां आयोजित कर रहे हैं बल्कि बालसाहित्यकारों  की श्रेष्ठ कृति/अथवा उनके समग्र योगदान के लिये जिला/राज्य एवम राष्ट्रीय स्तर के छोटे-बड़े पुरस्कार भी वितरित कर रहे हैं। यह अलग बात है कि इन सबके पीछे जो व्यवस्था और कार्यप्रणाली है उसमें अधिक पारदर्शिता, उदारता, और सुधार की  सतत गुंजाइश है।
कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक सभी विधाओं में नव्यतम प्रयोगों के साथ हिंदी मे अब विपुल मात्रा में साहित्य रचा जा रहा है और उन बाल-पात्रों की भी चिंता की जा रही है जिन्हें हाशिये पर पड़े पात्रों की संज्ञा दी जाती है। विस्तार के भय से यहां मैं उन सब का विवरण नहीं दे पा रहा हूं पर संदर्भवश बालसाहित्य की आलोचना विधा पर थोड़ी चर्चा करना अवश्य चाहूंगा। संदर्भ यह है कि गत अक्टूबर 2014 में प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका कथा ने सम्भवत: पहली बार बालसाहित्य आलोचना विशेषांक निकाला जिसमें हिंदी के एक सम्माननीय वरिष्ठ आलोचक ने अपने साक्षात्कार में कहा -बालसाहित्य में आलोचना की कोई व्यवस्थित परंपरा नहीं है। पता नहीं यह उनकी पीड़ा थी या व्यंजनात्मक टिप्पणी! लेकिन व्यवस्थित परंपरा से उनका अभिप्राय क्या था इसे मैं आज भी समझने की कोशिश कर रहा हूं! सम्भव है उनकी टिप्पणी का संदर्भ कुछ और रहा हो पर बालसाहित्य के एक शिक्षार्थी के रूप में मैं इतना तो निवेदन करना चाहूंगा ही कि बीसवीं शती के सातवें दशक से लेकर अबतक जो शताधिक शोध-प्रबंध लिखे गए या प्रकाशित हुए फ़िर चाहे वे बालसाहित्य के विविध पक्षों को उद्घाटित करते हों अथवा किसी बालसाहित्यकार के सम्पूर्ण अवदान को,  क्या वे व्यवस्थित आलोचना के खांचे मे फ़िट नहीं होते? 1967 में सुपरिचित बालसाहित्यकार श्री मनोहर वर्मा के संपादन मे राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित भारतीय बालसाहित्य –एक विवेचन, जो मधुमती पत्रिका के बालसाहित्य विशेषांक का ही पुस्तक रूप था,  क्या बालसाहित्य की व्यवस्थित आलोचना नहीं थी? इसके अलावा दिल्ली के राष्ट्रीय बाल भवन द्वारा डा. मधु पंत के संपादन में बालसाहित्य पर प्रकाशित अनेक संकलन जैसे त्रिविधा, त्रिधारा, त्रिवेणी, त्रिसंगम, त्रिवर्णा, त्रिसाम्या, त्रिपदा, त्रिदिशा, त्रिसंध्या, त्रिपथगा, जिनमें देश के अनेकानेक बालसाहित्यकारों, संपादकों, प्रकाशकों तथा पाठको ने बालसाहित्य की समग्रता पर जमकर विमर्श किया, वह भी बालसाहित्य आलोचना के क्षेत्र में अपने ढंग का अभूतपूर्व प्रयोग था। यही नहीं, पिछले कुछ वर्षों में शैक्षिक शोधप्रबंधों से परे कुछ और भी किताबें आई हैं जो हिंदी बालसाहित्य आलोचना की समृद्ध  विधा को रेखांकित करती हैं –ये पुस्तकें हैं –हिंदी बालकविता का इतिहास –डा. प्रकाश मनु, हिंदी बालसाहित्य-नई चुनौतियां और संभावनाएं-प्रकाश मनु, हिंदी बालसाहित्य के शिखर व्यक्तित्व - प्रकाश मनु, बालसाहित्य के प्रतिमान  - नागेश पांडेय संजय, हिंदी बालसाहित्य - डा.सुरेन्द्र विक्रम का योगदान - स्वाति शर्मा, डा. दिविक रमेश और उनका बालसाहित्य - सं. शकुंतला कालरा, हरिकृष्ण देवसरे का बालसाहित्य - ओमप्रकाश कश्यप, बालसाहित्य का स्वरूप और रचना संसार- सं.-शकुंतला कालरा, बालसाहित्य के युग निर्माता - जयप्रकाश भारती, सं-शकुंतला कालरा एवम रचना कुमार, किशोर साहित्य की संभावनाएं एवम रवींद्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य-दोनों के संपादक देवेंद्र कुमार देवेश, बच्चे, बचपन और बालसाहित्य –अखिलेश श्रीवास्तव चमन, हिंदी बालसाहित्य विमर्श –साहित्यिक साक्षात्कार – हिंदी बालसाहित्य विचार और चिंतन, तथा हिंदी बालसाहित्य विधा-ववेचन (तीनों पुस्तकों की संपादक –डा. शकुंतला कालरा। कहने का तात्पर्य यह कि हिंदी में बालसाहित्य की आलोचना विधा इतनी दरिद्र नहीं है जितना उसे प्रचारित किया जा रहा है।
विदेशी बालसाहित्य के वरक्स तुलनात्मक रूप से देखें तो हिंदी बालसाहित्य अपनी श्रेष्ठता में इक्कीस होते हुए भी भाषायी सीमा,समुचित प्रचार एवम वांछित विपणनतंत्र की कमजोरी के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह स्थान नहीं पा सका है जिसका वह हकदार है। हिंदी बाल पुस्तकों  को अपना बाजार देश के भीतर और बाहर दोनों जगह खोजना  पड़्ता है। हालांकि एन.बी.टी, प्रकाशन विभाग और कुछ निजी बडे प्रकाशकों ने इस क्षेत्र मे बड़ी लकीर खींचने की कोशिशें की हैं फ़िर भी पुस्तकों का छपना एक बात है और उनका सही पाठकों के हाथों तक पहुंचना दूसरी बात। पुस्तक मेलों में रंगविरंगी बाल-पुस्तकें देखकर बच्चे हर जगह आकर्षित होते हैं और उन पुस्तकों को बड़े ही चाव से उलटते-पलटते हैं पर इसमें दो राय नहीं कि बच्चों में साहित्य के प्रति अनुराग  जगाने तथा साहित्य की जीवन में भूमिका समझाने का पहला दायित्व अभिभावकों का ही होता है। यथार्थ में इस दायित्व का समुचित वहन कितने अभिभावक करते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। अंगरेजी बालपुस्तकों का वर्चस्व अभी भी बना हुआ है और हिंदी बालपुस्तकें अभी भी अपना रोना रोती नजर आती हैं। पब्लिक स्कूलों में यदि अंग्रेजी की जगह हिंदी का वाक्य मुंह से निकल जाये तो प्रताडंना के साथ-साथ जुर्माना भी लग जाता है और यह सब आकस्मिक नहीं, बल्कि प्रायोजित ढंग से हो रहा है। सारा खेल उपनिवेशवादी मानसिकता को संरक्षण देने वालों का रचा हुआ है।
हिंदी बालसाहित्य के संबंध मे यहां कुछ और चुनौतियों की चर्चा भी मैं करना चाहूंगा जिन पर कम बात की जाती है। मोटे रूप में देखें तो बालसाहित्य की उपादेयता उन्हीं के लिए है जो साक्षर हैं, शिक्षित हैं, और जिनमें साहित्य के प्रति अनुराग, संवेदना तथा ललक कमोवेश रूप में विद्यमान है। आधुनिक भारत में जिस तरह की आयातित शिक्षण पद्धति की ओर न्वधनाढ्य ,व मध्य वर्ग भाग रहा है वह बच्चों को रोबोट तो बना सकती है पर मनुष्य नहीं। कैरियरवादी शिक्षण में साहित्य की क्या जगह रह गई है यह आप पब्लिक स्कूलों के प्राथमिक शिक्षण के पाठ्यक्रम को ही देखकर पता लगा सकते हैं।  सुपरिचित लेखक, चिंतक डा0 प्रेममपाल शर्मा ने अपने अनेक लेखों में इस बात को रेखांकित किया है कि आज की शिक्षण पद्धति ने बच्चों को अनेक वर्गों में बांट दिया है जिनमें संपन्न और विपन्न दो बहुत बड़े वर्ग शामिल हैं। एक वर्ग ऐसा है जहां संपन्नता के बल पर महत्वाकांक्षाएं मूर्तमान होती हैं और दूसरा वर्ग ऐसा है जहां विपन्नता के चलते महत्वाकांक्षाएं कुंठाओं में परिवर्तित हो जाती हैं। यह हमारे वर्तमान में बाजार के बढ़ते प्रभाव का प्रतिफल है।
बाजार पहले भी था, पर जैसा कि एक लेखक ने कहा है, तब वह आपकी जरूरतें पूरी करता था। अब वह आपकी जरूरतें ही पूरी नहीं करता बल्कि जरूरतें पैदा भी करता है और ऐसी दुनिया में जीने के लिए आपको मजबूर करता है जिसमें साहित्य या विचार सिरे से नदारद है। आज के बच्चों की जिंदगी देखिए  ना, छोटी- छोटी उम्र के बच्चे आज पारंपरिक खेलों को छोड़ कर मोबाइल लैपटाप, टी-वी- गेम्स या उबाऊ सीरियलों में उलझे हे  हैं। आठों पहर बोझिल होमवर्क का भूत उनके सिर पर सवार रहता है। सिमटते परिवार और उनमें भी बुजुर्गों की अनुपस्थिति बच्चों की दिनचर्या में बालसाहित्य का प्रवेश करने ही नहीं देते।  प्राथमिक शिक्षा की बात करें तो हिंदी पाठ्यपुस्तकों में उन्हें ऐसी रचनाएं पढ़ाई जाती हैं जिनके मूल रचनाकारों का परिचय तक नहीं है और सुप्रसिद्ध रचनाओं की भौंड़ी नकल दूसरे रचनाकारों के नाम से शामिल की जा रही है। बालसाहित्य की जो पुस्तकें लिखी जा रही हैं उनके प्रकाशन का आसन्न संकट बना हुआ है और जिन सौभाग्यशाली बालसाहित्यकारों की पुस्तकें प्रकाशन का सबेरा देखती हैं या जिनके सौभाग्य से अनेक संस्करण भी निकल जाते हैं उनमें  संस्करण का वर्ष तो देखने को मिल जाता है पर उस संस्करण कीआवृत्ति पहली है, दूसरी है या तीसरी है इसे ढ़ूंढने में या तो आपकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाएगा  या फ़िर आपका पसीना छूट जाएगा। ऐसी परिस्थितियों में डा0 प्रकाश मनु जैसे समर्पित बाल साहित्यकार जो वर्षों से हिंदी बालसाहित्य का वृहत् इतिहास लिखने की धुन में लगे हैंकिस तरह की दुष्कर परिस्थितियों से होकर गुजर रहे होंगे इसकी कल्पना आप भली भांति कर सकते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि बालसाहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं या कृतियों पर चर्चा न करके मैं यह कौनसा प्रलाप करने यहां खड़ा हो गया हूं। पर मित्रो, यह तथाकथित प्रलाप भी उसी  यथार्थ का एक हिस्सा है जिसे आप हिंदी में बालसाहित्य की वर्तमान स्थिति नाम दे रहे हैं। अपने पैंतीस वर्षों के मुट्ठी भर बालसाहित्य लेखन के बाद भी मुझे लगातार ऐसा महसूस होता है  जैसे एक दुःस्वप्न मेरा पीछा कर रहा है। दुःस्वप्न यह है कि बाल साहित्य की धारा में जल तो कम होता जा रहा है और प्रस्तर खंडों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे बालसाहित्य की धारा के सहज प्रवाह में विचलन और अवरोध दोनों पैदा हो रहे हैं। संभव है कि आपको यह निराशा भरा वाक्य अच्छा न लगे पर जरा इसकी गंभीरता पर आप सोचें कि एक बीज के खराब होने का अर्थ है - पूरे वृक्ष का खराब हो जाना और एक पूरे वृक्ष के खराव होने का अर्थ है संपूर्ण वृक्षावली की सेहत को खतरा। बाल साहित्य के वर्तमान परिदश्य पर नजर डालें तो ऐसा साहित्यिक प्रदूषण आपको जगह-जगह देखने को मिल जाएगा।
यूरोपियन तथा अफ़्रीकी देशों में बालपुस्तकों के संदर्भ में एक सांस्कृतिक संकट उत्पन्न हो गया है। वहां बालसाहित्य में जो कुछ अनुपस्थित है उसको लेकर अनेक सवाल उठाए जा रहे हैं।  यूरोप में बालसाहित्य के आलोचकों को इस बात को लेकर चिंता है कि वहां की पुस्तकों में श्वेतवर्णी पात्र ही क्यों भरे पड़े है, और श्याम वर्णी पात्र क्यों नहीं है? या फ़िर विकलांग  बालपात्रों को ले कर अच्छी बाल पुस्तकें क्यों नहीं लिखी जा रही हैं। अफ़्रीका की सुविख्यात शिक्षाविद् ,व लेखिका डा0 फातिमा अकीलु ने तो आयातित उपनिवेशवादी संस्कृति दर्शाने वाली बाल पुस्तकों को अपने देश की शिक्षा प्रणाली से हटवा कर स्वयं ऐसी अनेकों बालपुस्तकें लिख कर क्रांति कर दी है जिनमें अफ़्रीकी संस्कृति का वर्चस्व दिखाई देता है अन्यथा तो उपनिवेशवादी संस्कृति वाली बालपुस्तकों  से तो वहां के बच्चे अपना संबंध् जोड़ ही नहीं पाते थे क्योंकि उन पुस्तकों में न तो उन जैसे पात्र थे और न ही उनका अपना सांस्कृतिक परिवेश था। भारतीय बालसाहित्य में भी  ऐसा बहुत कुछ अनुपस्थित है जो हमें खलता है पर फ़िलहाल इतने बड़े स्तर पर ऐसा सांस्कृतिक संकट हिंदी बाल साहित्य में नहीं उपजा है। फ़िर भी जरूरी है कि हम बालसाहित्यकार अपने अनुभवों और दृष्टिफलक का विस्तार करें जिससे हमारी हिंदी की रचनाओं को विश्वव्यापी प्रसार मिल सके।
स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक तकनीक और औद्योगिक क्षेत्र में हुए त्वरित विकास ने भारत को एक नई जीवनशैली  दी हैं। जिसके कुछ सकारात्मक परिणाम हुए हैं तो कुछ नकारात्मक परिणाम भी हुए हैं।  सकारात्मक ये कि जीवन के सभी क्षेत्रों में सुख, सुविधाओं तथा भौतिक संपन्नता में बढ़ोतरी हुई है और नकारात्मक ये कि यह सारा वैभव मानव समाज के एक सीमित वर्ग में सिमटकर रह गया है। यांत्रिक निर्भरता, क्रूरता, संवेदनहीनता तथी एकाकीपन जैसी व्याधियां  न केवल सहज स्वीकार्य होने लगी हैं अपितु वे हमारे जीवन को अपनी तरह से नियंत्रित एवं संचालित भी करने लगी हैं। मौलिक स्तरीय रचनात्मक बालसाहित्य को अब तेजी से दोयम दर्जे का सूचनात्मक  बालसाहित्य स्थानापन्न कर रहा है। एक जमाना था जब दिल्ली के पटरीबाजार में उत्कृष्ट साहित्य की पुस्तकें कम से कम कीमत पर सहजता से उपलब्ध हो जाया करती थीं और एक जमाना अब है जब हर जगह आयातित,व्यावसायिक प्रतियोगिता तथा तकनीकी पुस्तकों-पत्रिकाओं का अंबार लगा दिखता है और बालसाहित्य तो दूर की बात, वयस्क साहित्य की पुस्तकें भी वहां ढूंढे नहीं मिलतीं।  विकसित प्रोद्योगिकी हमें भौतिक रूप से समृद्ध तो कर रही है पर हमें और हमारी नई पीढ़ी को सम्वेदनशील होना है तो इसमें साहित्य और कलाकर्म ही आपका सहायक होगा.
अंत में एक छोटी-सी महत्वपूर्ण बात कहकर मैं अपने वक्तव्य को यहां विराम देना चाहूंगा। और वह यह है कि यदि आधुनिक भारत की बालसाहित्य और बालसाहित्यकारों से कुछ अपेक्षाएं हैं तो बालसाहित्यकारों की भी अपने देश के कर्णधारों से कुछ अपेक्षाएं हैं। ऐसा क्यों नहीं होता कि सरकारें मसिजीवी साहित्यकारों के प्रति संवेदनशील रहती है। 
मसिजीवी हिंदी साहित्यकारों की स्थित दयनीय भले ही न हो पर चिंतनीय अवश्य है। उनके हितों को ध्यान में रखते हुए  कम से कम पुस्तकों के प्रकाशन के समय प्रकाशकीय विवरण में मुद्रित प्रतियों की संख्या, आवृत्ति या संस्करण की संख्या तथा लेखकों की एक वाक्यीय धोषणा कि उन्हें उनकी रचना का समुचित पारिश्रमिक दिया जा चुका है, आदि का उल्लेख कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया जाना चाहए। 
लेखक-प्रकाशक के संबंध के बीच पारदर्शिता बनाए रखने में यह एक सार्थक कदम होगा। जहां तक बालसाहित्य की पुस्तकों की कीमत का संबंध् है तो निजी प्रकाशकों की तो सदा से मनमानी चली है। हां, सरकारी स्वायत्त प्रकाशन गृह काफी समय तक इस पर कुछ नियंत्रण रखे हु, थे। लेकिन अब वे भी इस दौड़ में निजी प्रकाशकों को पीछे छोड़ रहे हैं। यदि यही प्रतियोगिता चलती रही तो बालसाहित्य का वर्तमान तो प्रभावित होगा ही, उसका भविष्य भी संकटापन्न हो जाएगा। इसलिए इस  विषम स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि लेखक, प्रकाशक और पाठक के त्रिकोणीय संबंधों में पारदर्शिता, शुचिता और पारस्परिक विश्वसनीयता सतत रूप से बनी रहे । एक संवेदनशील बाल-साहित्यकार होने के नाते कम से कम इतनी दुआ तो मुझे करनी ही चाहिए।#




संपर्क:
506 गौड़गंगा-1, वैशाली, सेक्टर-4, गाज़ियाबाद-201012, मो. 09211688748, ईमेल-rtailang@gmail.com





Friday, December 19, 2014

प्रकाश मनु की बाल कविताएं


आधुनिक भारत की अपेक्षा और बालसाहित्य का वर्तमान- रमेश तैलंग



राष्ट्रीय पुस्तक न्यास-भारत द्वारा रविवार, 2 नवंबर, 2014 को गाज़ियाबाद में
आयोजित एक संगोष्ठी में पढ़ा गया आलेख

मित्रो, आज की इस बालसाहित्य संगोष्ठी में चर्चा का जो  विषय निर्धारित है उसमें दो शब्दों पर आपका ध्यान मैं विशेष रूप से आकर्षित करना चाहूगा। पहला शब्द है आधुनिक और दूसरा वर्तमान।  क्या ये दोनों कालसूचक शब्द अपने आप में स्वतंत्र इकाई हैं? मुझे नहीं लगता कि कोई भी आधुनिकता निरंतर गतिमान होकर भी पारंपरिकता से अपने आप को पूर्णत: विलग कर सकती है। इसी तरह वर्तमान के साथ भी उसका अतीत और भविष्य नाभि-नाल की तरह जुड़ा रहता है, पिफर आप चाहें या न चाहें। लेकिन मेरी इस अवधारणा आप चौंके नर्ही। सच तो यह है कि हम अपने वर्तमान में ही जीते हैं। साहित्य अथवा बालसाहित्य के अस्तित्व की वास्तविकता भी उसके वर्तमान में ही ज्योतिर्मय दिखती है। एक तरह से देखें तो इन दोनों शब्दों को हम अपनी समकालीनता का पर्याय भी मानकर चल सकते हैं।
अब विचारणीय बात यह है कि आधुनिक भारत क्या है, कैसा है और यदि उसकी बालसाहित्य अथवा बालसाहित्यकारों से कुछ अपेक्षा हैं तो वे कौनसी हैं और क्या वे वर्तमान में पूरी हो रही हैं अथवा नहीं।  प्रश्न यह भी उठ सकता है कि आज का भारत जिसे हम आधुनिक भारत कह रहे हैं उसमें बालसाहित्य का वर्तमान या प्रांसंÛिक होना कितना अर्थवान है। ये ऐसे संश्लिष्ट प्रश्न हैं जिनका उत्तर हांया में नहीं दिया जा सकता। हां, उनके प्रवृत्तिगत संकेत या संकेतात्मक उत्तर अवश्य ढूंढ़े जा सकते हैं। अपने आलेख के जरि,  मैंने यहां ऐसी ही एक विनम्र कोशिश की है जो स्पष्ट कारणों से हिंदी बालसाहित्य के परिदृश्य तक ही सीमित है। यह अलग बात है कि ऐसा परिदृश्य कुछ अन्य भाषाओं के बालसाहित्य में भी मौज़ूद हो।
हम जिस संक्रांतिकाल में जी रहे हैं वह बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, संस्कृति और व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से बहुत अनुकूल समय नहीं है। दुनिया के बच्चों पर आज अनेक तरह के संकट गहराए हुए, हैं। ये संकट दैहिक शोषण के भी हैं और मानसिक शोषण के भी ।  भारत जैसे विशाल और विकासशील देश में यह समस्या और भी ज्यादा जटिल है। सवा सौ करोड़ वाले इस देश में, जहां लभ एक तिहाई आबादी 18 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों-बच्चियों की हो और जिसका बहुत बड़ा हिस्सा कुपोषण, अशिक्षा, असुरक्षा, और तरह-तरह की हिंसात्मक विभीषिकाओं से त्रस्त हो, वहां सतही तौर पर कुछ गिनी-चुनी पसंदीदा अथवा नापसंदीदा कृतियों की श्रेष्ठता या दयनीयता का बखान करके हम बालसाहित्य के वर्तमान पर कोई र्निणयात्मक टिप्पणी चस्पां नहीं कर सकते।  पर इसका यह अर्थ नहीं कि हिंदी में बालसाहित्य की सृजनात्मक ,एवं आलोचनात्मक परंपरा है ही नहीं। है, और इस समृद्ध परंपरा का उत्स भी लगभग शताध्कि वर्ष पीछे ढूंढा जा सकता है। उसकी संक्षिप्त चर्चा मैं आगे करूंगा। पर अभी बालसाहित्य के वर्तमान के कृष्ण पक्ष पर एक दृष्टि डाल ली जाए।
मोटे रूप में देखें तो बालसाहित्य की उपादेयता उन्हीं के लिए है जो साक्षर हैं, शिक्षित हैं, और जिनमें साहित्य के प्रति अनुराग, संवेदना तथा ललक कमोवेश रूप में विद्यमान है। आधुनिक भारत में जिस तरह की आयातित शिक्षण पद्धति की ओर न्वधनाढ्य ,व मध्य वर्ग भाग रहा है वह बच्चों को रोबोट तो बना सकती है पर मनुष्य नहीं। कैरियरवादी शिक्षण में साहित्य की क्या जगह रह गई है यह आप पब्लिक स्कूलों के प्राथमिक शिक्षण के पाठ्यक्रम को ही देखकर पता लगा सकते हैं।  सुपरिचित लेखक, चिंतक डा0 प्रेममपाल शर्मा ने अपने अनेक लेखों में इस बात को रेखांकित किया है कि आज की शिक्षण पद्धति ने बच्चों को अनेक वर्गों में बांट दिया है जिनमें संपन्न और विपन्न दो बहुत बड़े वर्ग शामिल हैं। एक वर्ग ऐसा है जहां संपन्नता के बल पर महत्वाकांक्षाएं मूर्तमान होती हैं और दूसरा वर्ग ऐसा है जहां विपन्नता के चलते महत्वाकांक्षाएं कुंठाओं में परिवर्तित हो जाती हैं। यह हमारे वर्तमान में बाजार के बढ़ते प्रभाव का प्रतिपफल है।
बाजार पहले भी था, पर जैसा कि एक लेखक ने कहा है, तब वह आपकी जरूरतें पूरी करता था। अब वह आपकी जरूरतें ही पूरी नहीं करता बल्कि जरूरतें पैदा भी करता है और ऐसी दुनिया में जीने के लि, आपको मजबूर करता है जिसमें साहित्य या विचार सिरे से नदारद है। आज के बच्चों की जिंदगी देखिए  ना, छोटी- छोटी उम्र के बच्चे आज पारंपरिक खेलों को छोड़ कर मोबाइल लैपटाप, टी-वी- गेम्स या उबाऊ सीरियलों में उलझे हे  हैं। आठों पहर बोझिल होमवर्क का भूत उनके सिर पर सवार रहता है। सिमटते परिवार और उनमें भी बुजुर्गों की अनुपस्थिति बच्चों की दिनचर्या में बालसाहित्य का प्रवेश करने ही नहीं देते।  प्राथमिक शिक्षा की बात करें तो हिंदी पाठ्यपुस्तकों में उन्हें ऐसी रचनाएं पढ़ाई जाती हैं जिनके मूल रचनाकारों का परिचय तक नहीं है और सुप्रसिद्ध रचनाओं की भौंड़ी नकल दूसरे रचनाकारों के नाम से शामिल की जा रही है। बालसाहित्य की जो पुस्तकें लिखी जा रही हैं उनके प्रकाशन का आसन्न संकट बना हुआ है और जिन सौभाग्यशाली बालसाहित्यकारों की पुस्तकें प्रकाशन का सबेरा देखती हैं या जिनके सौभाग्य से अनेक संस्करण भी निकल जाते हैं उनमें  संस्करण का वर्ष तो देखने को मिल जाता है पर उस संस्करण कीआवृत्ति पहली है, दूसरी है या तीसरी है इसे ढ़ूंढने में या तो आपकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाएगा  या फ़िर आपका पसीना छूट जाएगा। ऐसी परिस्थितियों में डा0 प्रकाश मनु जैसे समर्पित बाल साहित्यकार जो वर्षों से हिंदी बालसाहित्य का वृहत् इतिहास लिखने की धुन में लगे हैं,  किस तरह की दुष्कर परिस्थितियों से होकर गुजर रहे होंगे इसकी कल्पना आप भली भांति कर सकते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि बालसाहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं या कृतियों पर चर्चा न करके मैं यह कौनसा प्रलाप करने यहां खड़ा हो गया हूं। पर मित्रो, यह तथाकथित प्रलाप भी उसी  यथार्थ का एक हिस्सा है जिसे आप बालसाहित्य का वर्तमाननाम दे रहे हैं। अपने पैंतीस वर्षों के मुट्ठी भर बालसाहित्य लेखन के बाद भी मुझे लगातार ऐसा महसूस होता है  जैसे एक दुःस्वप्न मेरा पीछा कर रहा है। दुःस्वप्न यह है कि बाल साहित्य की धारा में जल तो कम होता जा रहा है और प्रस्तर खंडों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे बालसाहित्य की धारा के सहज प्रवाह में विचलन और अवरोध दोनों पैदा हो रहे हैं। संभव है कि आपको यह निराशा भरा वाक्य अच्छा न लगे पर जरा इसकी गंभीरता पर आप सोचें कि एक बीज के खराब होने का अर्थ है - पूरे वृक्ष का खराब हो जाना और एक पूरे वृक्ष के खराव होने का अर्थ है संपूर्ण वृक्षावली की सेहत को खतरा। बाल साहित्य के वर्तमान परिदश्य पर नजर डालें तो ऐसा साहित्यिक प्रदूषण आपको जगह-जगह देखने को मिल जाएगा।
यूरोपियन तथा अफ़्रीकी देशों में बालपुस्तकों के संदर्भ में एक सांस्कृतिक संकट उत्पन्न हो गया है। वहां बालसाहित्य में जो कुछ अनुपस्थित है उसको लेकर अनेक सवाल उठाए जा रहे हैं।  यूरोप में बालसाहित्य के आलोचकों को इस बात को लेकर चिंता है कि वहां की पुस्तकों में श्वेतवर्णी पात्र ही क्यों भरे पड़े है, और श्याम वर्णी पात्र क्यों नहीं है? या फ़िर विकलांग  बालपात्रों को ले कर अच्छी बाल पुस्तकें क्यों नहीं लिखी जा रही हैं। अफ़्रीका की सुविख्यात शिक्षाविद् ,व लेखिका डा0 शफातिमा अकीलु ने तो आयातित उपनिवेशवादी संस्कृति दर्शाने वाली बाल पुस्तकों को अपने देश की शिक्षा प्रणाली से हटवा कर स्वयं ऐसी अनेकों बालपुस्तकें लिख कर क्रांति कर दी है जिनमें अफ़्रीकी संस्कृति का वर्चस्व दिखाई देता है अन्यथा तो उपनिवेशवादी संस्कृति वाली बालपुस्तकों  से तो वहां के बच्चे अपना संबंध् जोड़ ही नहीं पाते थे क्योंकि उन पुस्तकों में न तो उन जैसे पात्र थे और न ही उनका अपना सांस्कृतिक परिवेश था। भारतीय बालसाहित्य में भी  ऐसा बहुत कुछ अनुपस्थित है जो हमें खलता है पर फ़िलहाल इतने बड़े स्तर पर ऐसा सांस्कृतिक संकट हिंदी बाल साहित्य में नहीं उपजा है। फ़िर भी जरूरी है कि हम बालसाहित्यकार अपने अनुभवों और दृष्टिपफलक का विस्तार करें जिससे हमारी हिंदी की रचनाओं को विश्वव्यापी प्रसार मिल सके।
स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक तकनीक और औद्योगिक क्षेत्र में हुए त्वरित विकास ने भारत को एक नई जीवनशैली  दी हैं। जिसके कुछ सकारात्मक परिणाम हु, हैं तो कुछ नकारात्मक परिणाम भी हु, हैं।  सकारात्मक ये कि जीवन के सभी क्षेत्रों में सुख, सुविधाओं तथा भौतिक संपन्नता में बढ़ोतरी हुई है और नकारात्मक ये कि यह सारा वैभव मानव समाज के एक सीमित वर्ग में सिमटकर रह गया है। यांत्रिक निर्भरता, क्रूरता, संवेदनहीनता तथी एकाकीपन जैसी व्याधियां  न केवल सहज स्वीकार्य होने लगी हैं अपितु वे हमारे जीवन को अपनी तरह से नियंत्रित एवं संचालित भी करने लगी हैं।
मौलिक स्तरीय रचनात्मक बालसाहित्य को अब तेजी से दोयम दर्जे का सूचनात्मक  बालसाहित्य स्थानापन्न कर रहा है। एक जमाना था जब दिल्ली के पटरीबाजार में उत्कृष्ट साहित्य की पुस्तकें कम से कम कीमत पर सहजता से उपलब्ध हो जाया करती थीं और एक जमाना अब है जब हर जगह आयातित,व्यावसायिक प्रतियोगिता तथा तकनीकी पुस्तकों-पत्रिकाओं का अंबार लगा दिखता है और बालसाहित्य तो दूर की बात, वयस्क साहित्य की पुस्तकें भी वहां ढूंढे नहीं मिलतीं।
पुस्तकों का छपना एक बात है और उनका सही पाठकों के हाथों तक पहुंचना दूसरी बात। पुस्तक मेलों में रंगविरंगी बाल-पुस्तकें देखकर बच्चे हर जगह आकर्षित होते हैं और उन पुस्तकों को बड़े ही चाव से उलटते-पलटते हैं पर इसमें दो राय नहीं कि बच्चों में साहित्य के प्रति अनुराग  जगाने तथा साहित्य की जीवन में भूमिका समझाने का पहला दायित्व अभिभावकों का ही होता है। यथार्थ में इस दायित्व का समुचित वहन कितने अभिभावक करते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। अंगरेजी बालपुस्तकों का वर्चस्व अभी भी बना हुआ है और हिंदी बालपुस्तकें अभी भी अपना रोना रोती नजर आती हैं। पब्लिक स्कूलों में यदि अंग्रेजी की जगह हिंदी का वाक्य मुंह से निकल जाये तो प्रताडंना के साथ-साथ जुर्माना भी लग जाता है और यह सब आकस्मिक नहीं, बल्कि प्रायोजित ढंग से हो रहा है। सारा खेल उपनिवेशवादी मानसिकता को संरक्षण देने वालों का रचा हुआ है।
            बालसाहित्य के वर्तमान का यह तो हुआ  कृष्ण पक्ष। अब संक्षेप में जरा शुक्ल पक्ष की भी बात कर लें।  इसमें संदेह नहीं कि हिंदी बालसाहित्य की परंपरा पिछले सौ-सवासौ सालों में काफी समृद्ध हुई है। और ऐसा सिर्फ कहानी कविता के क्षेत्र में नहीं बल्कि साहित्य की अन्य विधाओं में भी हुआ है। अनेकानेक कठिनाइयों के बावजूद इधर के कुछ दशकों में हिंदी बाल साहित्य की रचना के साथ-साथ आलोचना में भी गंभीर काम हुआ है। भले ही यह बात वयस्क हिंदी साहित्य के स्वनामध्न्य आलोंचकों के गले न उतरे।  खुसरो की मुकरियों से लेकर आधुनिक बाल रचनाओं तक हिंदी की बाल पुस्तकों पर नजर डालें तो सैंकड़ों उपन्यास कहानियां, कविता,, नाटक, जीवनियां, विज्ञान पुस्तकें तथा अन्य विधाओं में रचा गया बालसाहित्य हमारे सामने आ चुका है पर एक खाई है जो पुस्तकों और बच्चों के बीच अभी भी बनी हुई है।
हिंदी के बड़े-से बड़े लेखकों ने बालसाहित्य रचा है और उसके अतीत पर हम गर्व कर सकते हैं। हमारे अपने समय के स्मरणीय बालसाहित्यकारों में प्रेमचंद, श्रीधर पाठक,दिनकर, महादेवी वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जहूर बख्श, रामनरेश त्रिपाठी मन्नन द्विवेदी, सोहनलाल द्विवेदी, निरंकार देव सेवक, शकुतला सिरोठिया, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी अमृतलाल नागर, मस्तराम कपूर,डा0 श्री प्रसाद से ले कर डा0 हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती,  डा0 राष्ट्रबंधु, प्रकाश मनु, देवेंद्र कुमार, दिविक रमेश, विनायक, हरिकृष्ण तैलंग, हसन जमाल, रोहिताश्व अस्थाना, शंकर सुलतानपुरी,संजीव जायसवाल संजय, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, सुरेंद्र विक्रम, उषा यादव, क्षमा शर्मा, पंकज चतुर्वेदी, जाकिर अली रजनीश, मोहम्मद साजिद खान, अरशद खान, आदि युवा एवं वरिष्ठ बालसाहित्यकारों की लंबी पांत है जिनकी पूरी सूची दी जा, तो ऐसे कई आलेख सैंकड़ों पृष्ठों में भी नहीं समा सकेंगे।
यहां यह बात स्मरण रखने योग्य है कि शिक्षा और बालसाहित्य दोनों एक दूसरे पर परस्पररूप से निर्भर है। भारत की आशा उसकी नई पीढ़ी पर ही टिकी है और नई पीढ़ी को यदि यांत्रिकता और संवेदनहीनता से बचे रखना है तो न केवल श्रेष्ठ बालसाहित्य को उसके जीवन का अंग बनाना होगा बल्कि इसके लिए, प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च्तर शिक्षा तक के ढांचे में भी वांछित परिवर्तन लाना होगा।
अंत में एक छोटी-सी महत्वपूर्ण बात कहकर मैं अपने वक्तव्य को यहां विराम देना चाहूंगा। और वह यह है कि यदि आधुनिक भारत की बालसाहित्य और बालसाहित्यकारों से कुछ अपेक्षाएं हैं तो बालसाहित्यकारों की भी अपने देश के कर्णधारों से कुछ अपेक्षाएं हैं। ऐसा क्यों नहीं होता कि सरकारें मसिजीवी साहित्यकारों के प्रति संवेदनशील रहती हैआ। 
मसिजीवी हिंदी साहित्यकारों की स्थित दयनीय भले ही न हो पर चिंतनीय अवश्य है। उनके हितों को ध्यान में रखते हुए  कम से कम पुस्तकों के प्रकाशन के समय प्रकाशकीय विवरण में मुद्रित प्रतियों की संख्या, आवृत्ति या संस्करण की संख्या तथा लेखकों की एक वाक्यीय धोषणा कि उन्हें उनकी रचना का समुचित पारिश्रमिक दिया जा चुका है, आदि का उल्लेख कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया जाना चाहए। 
लेखक-प्रकाशक के संबंधें के बीच पारदर्शिता बनाए रखने में यह एक सार्थक कदम होगा। जहां तक बालसाहित्य की पुस्तकों की कीमत का संबंध् है तो निजी प्रकाशकों की तो सदा से मनमानी चली है। हां, सरकारी स्वायत्त प्रकाशन गृह काफी समय तक इस पर कुछ नियंत्रण रखे हु, थे। लेकिन अब वे भी इस दौड़ में निजी प्रकाशकों को पीछे छोड़ रहे हैं। यदि यही प्रतियोगिता चलती रही तो बालसाहित्य का वर्तमान तो प्रभावित होगा ही, उसका भविष्य भी संकटापन्न हो जाएगा।
इसलिए इस  विषम स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि लेखक, प्रकाशक और पाठक के त्रिकोणीय संबंधों में पारदर्शिता, शुचिता और पारस्परिक विश्वसनीयता सतत रूप से बनी रहे । एक संवेदनशील बाल-साहित्यकार होने के नाते कम से कम इतनी दुआ तो मुझे करनी ही चाहिए।

डा0 शेरजंग गर्ग की बालकविताओं के रंग -रमेश तैलंग




डा. शेरजंग गर्ग



बालसुलम भाषा,  छंद-लय का अद्भुत रचाव और कसाव  

80 के दशक की बात होगी। मैं हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह के प्रशासनिक विभाग में कार्यरत था। तब एच।टी। हाउस में हिंदी तथा अन्य भाषाओं के  बड़े-बड़े लेखक-कवि, अक्सर आते-जाते दिख जाया करते थे। साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी और नंदन जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादकगण और साहित्यकारों का मेला लगा रहता था वहां। आदरणीय राही जी तो वहां थे ही और शेरजंग गर्ग जी भी शाम को यदा-कदा आते रहते थे। आप सभी को शायद पता होगा कि दिल्ली के कनाॅटप्लेस क्षेत्र में दो जगहें बड़ी मशहूर रही हैं, पहला टी हाउस और दूसरा एच।टी। हाउस। टी हाउस के बारे में शेरजंगजी ने अद्भुत संस्मरण लिखा है और बलदेव बंशी ने तो उस पर एक बेमिसाल बड़ी किताब ही संपादित कर दी है। बहरहाल, मैं कहने यह जा रहा था कि साहित्य जंगत की इन दो बड़ी हस्तियों -राही जी और शेरजंग गर्ग को मैंने कविसम्मेलनों के अलावा हिंदुस्तान टाइम्स के भवन में ही देखा।  उनके साहित्यिक अवदान से मैं परिचित था और  यह वह जमाना था जब साहित्यकार भी सेलिब्रिटीज हुआ करते थे। आज भी होते हैं पर अब कुछ दूसरी तरह के होते हैं।
मेरी व्यक्तिगत साहित्यिक रुचि गीत, गजल, बालकविता सहित गद्य की अनेक विधाओं में थी इसलिए राही जी और शेरजंगजी दोनों मेरे प्रिय कवियों में से थे और अब भी है। पर यहां अपने लोभ का संवरण करते हुए विषयांतर नहीं करूंगा और अपने केंद्रीय विषय-शेरजंग गर्ग की बालकविताओ के रंगतक ही अपने को सीमित रखूंगा।
देहरादून में जन्मे डा0 शेरजंग गर्ग की बालकविताओं के बारे में मेरे जैसे अदना कद के पाठक को कुछ बोलते हुए संकोच भी हो रहा है, क्योंकि गर्गजी और राहीजी उन कवियों में से है जिनकी बालकविताएं पढ़ते हुए हमने बालकविता की बारहखड़ी सीखी है। इस कथन को आप मेरी माडेस्टी न समझें बल्कि इसे यथोचित गंभीरता से लें। गर्गजी का जब मुझे फोन आया तो उन्होने अन्य बातों के बीच यह भी कहा कि मैं पूरी निर्ममता से उनकी बालकविताओं का आकलन करूं। अब मित्रों, निर्ममता तो कसाइयों में होती है और चाटुकारिता चारणों-भाटों में। यदि ये वृत्ति की मजबूरी है तो और बात है पर अभी ये तमोगुण मुझसे दूर हैं।
गर्गजी ने हिंदी बालकविता को न केवल आधार बल्कि एक ऊंचा मयार दिया है। बालसुलम भाषा,  छंद-लय का रचाव और कसाव, और थोड़े शब्दों में बड़ी बात बिना कोई उपदेश के बालकविता में कह देना कोई गर्ग जी से सीखे। हिंदी बालसाहित्य में बच्चों के कार्यकलाप और उनके संसार की अनेक मनोहारी छवियां और विविध रस-रंग आपको देखने को मिलेंगे पर गर्गजी की बालकविताओं, खासकर उनके शिशुगीतों में जो विशिष्टता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अक्सर शिकायत की जाती है कि हिंदी बालकविताओं  में हास्य और विशेष रूप से व्यंग्य की गुंजाइश न के बराबर है पर गर्गजी की बालकविताएं सिर्फ बच्चों को गुदगुदाती नहीं बल्कि बड़ों की सोच पर दस्तक भी देती है और व्यंग्य की मीठी चुभन भी आपको वहां देखने को मिल जाती है। उदाहरण के लिए उनकी यदि पेड़ों पर उगते पैसेबाल कविता को लीजिए - अनुभव होते कैसे-कैसे/ जीवन चलता जैसे-तैसे/ सारे उल्लू चुगते पैसे/यदि पेडों पर उगते पैसे/जो होता अमीर ही होता/फिर गरीब क्यों पत्थर ढोता/क्यों कोई किस्मत को रोता/जीवन नींद चैन की सोता/ हर कोई पैसा ही बोता/स्वप्न न आते ऐसे-वैसे/यदि पेड़ों पर उगते पैसे । पर आप जानते हैं कि पैसा मनुय से बड़ा कभी नहीं हो सकता । गर्गजी की  भी यही मान्यता है- यदि होती पैसे की सत्ता/निर्मम होता पत्ता-पत्ता/हो कितना  मनमोहक पैसा/लेकिन कब फल-फूलों जैसा/पैसा ताजी हवा नहीं है/सब रोगों की दवा नहीं है/सचमुच नया रोग है पैसा/हम इसको अपनाते कैसे/यदि पेडों पे उगते पैसे/जाहिर है कि यह  बच्चों के लिए बड़ी कविता है और बडों के लिए यह बचकानी कविता हो क्योकि उनकी अक्ल परं तो इसका असर होने से रहा।
व्यंग्य की ही थोड़ी बहुत महक लिए गर्ग जी की एक और बालकविता है तीनों बंदर महाधुरंधर ये बंदर कौन हैं, ये बापू के ही बंदर हैं जो पहले आंख, मुंह और कान बंद किए रहते थे। पर अब वे दुनिया की चालाकियां समझ गए हैं और इसलिए तीनों में से हर एक बंदर ने सोच लिया है कि -दुष्टजनों से सदा लड़ेगा/इस चश्मे से रोज पढेगा/..आया नया जमाना आया/नया तरीका सबको भाया/तीनों बंदर बदल गए हैं/तीनों बंदर संभल गए हैं।
खिड़की  और उल्लूमियां  भी गर्गजी की बहुत ही मनोरंजक बाल कविताएं हैं पर उनकी एक बहुत ही यादगार बाल कविता है देश’। देशभक्ति के यांत्रिक नारे उछाले बिना, बड़ी बात को सरल-सहज शब्दों में बच्चों को किस तरह समझाया जा सकता है इसका अनुपम उदाहरण है ये कविता -इसकी उठान और ढलान दोनों देखिए -
ग्राम नगर या कुछ लोगों का काम नहीं होता है देश/ संसद, सड़कों आयोगों का नाम नहीं होता है देश/देश नहीं होता है केवल सीमाओं से घिरा मकान/ देश नहीं होता है कोई सजी हुई ऊंची दूकान/देश नहीं क्लब जिसमें बैठे करते रहें सदा हम मौज/ देश नहीं केवल बंदूकें, देश नहीं होता है फौज/ ....जहां प्रेम के दीपक जलते वहीं हुआ करता है देश/जहां इरादे नहीं बदलते, वहीं हुआ करता है देश/ पहले हम खुद को पहचानें फिर पहचानें अपना देश/ एक दमकता सत्य बनेगा, नहीं रहेगा सपना देश
गर्गजी के चुस्त-दुरुस्त और चुटीले शिशुगीतों की चर्चा करूं इससे पहले मैं गर्गजी की एक और बालकविता का उल्लेख यहां करना चाहूंगा जो बच्चों के लिए नए साल का शुभसंदेश लिए हुए है। गौर करें कि यहां मैंने शुभसंदेश की बात की है, “शुभ उपदेशकी नहीं। नए साल की शुरूआत शुभ हो और वह भी इस बालकविता जैसी तो किसका मन नहीं खिल उठेगा - नए साल में ताजे सुंदर फूल खिलेंगे / नए साल में नए-पुराने मित्र मिलेंगे/ नए साल में भैया-दीदी खूब पढ़ेंगे/कोई कितनी करे शरारत, नहीं लड़ेंगे/नए साल में रंग खुशी का चोखा होगा/नए साल में हर त्योहार अनोखा होगा/स्वस्थ रहेगी प्यारी दादी नए साल में/गुडि़या की भी होगी शादी नए साल में। अच्छे-अच्छे काम करेंगे नए साल में/सीधे सच्चे नहीं डरेंगे नए साल में@/भैया की उग आए दाढ़ी नए साल में/ छुक-छुक चले हमारी गाड़ी नए साल में/
विध्वंसात्मक गतिविधयों से रचनात्मक गतिविधि की ओर प्रेरित करने वाली गर्ग जी की यह बाल कविता भी मुझे बहुत प्रिय है -ईंट नहीं लड़ने की चीज/यह है कुछ गढ़ने की चीज
यदि आपको लग रहा है कि ये कुछ बड़े फलक की बाल कविताएं हैं तो अब आते हैं गर्गजी के शिशुगीतों पर। हालांकि जिन बालकविताओं का जिक्र अभी तक हुआ है वे भी शिशुगीतों में शामिल की जा सकती हैं क्योंकि वे दस-बारह पंक्तियों से अधिक की नहीं हैं। फिर भी अच्छे उस्ताद के फन की जो खूबसूरती होती है वह गर्गजी की हर बाल कविता में दिखाई देती है...... धर्मयुग, पराग जैसी पत्रिकाओं में धूम मचाने वाले शिशुगीतों के रचनाकारों में गर्गजी प्रथम पंक्ति में आते हैं- गाय बाला शिशुगीत तो आप में से शायद बहुतों को याद होगा -कितनी भोली-प्यारी गाय@सब पशुओं से न्यारी गाय/सारा दूध हमें दे देती/आओं इसे पिला दें चाय/अब यहां जो गाय को चाय पिलाने वाली कल्पना है वह अपने आप में मौलिक और अद्भुत है। आप जानते हैं कि सामान्यतः गाय अपने ही उत्पादन जैसे दूध, दही, घी आदि से बनी हुई चीजों को देखकर मुंह फेर लेती है। लेकिन गाय यदि आधुनिक युग की हुई तो वह चाय को अवश्य ग्रहण कर लेगी। और यदि बिस्कुट साथ होंगे तो आप भी परहेज नहीं करेंगे। अब खाने-पीने की बात चली है तो हलवा खाने वाली अम्मा का भी शिशुगीत सुन लिया जाए तो क्या बुरा है- हलवा खाने वाली अम्मां/लोरी गाने वाली अम्मां/मुझे सुनाती रोज कहानी/नानी की है मित्र पुरानी्/पापा की है आधी अम्मा/मेरी पूरी दादी अम्मां/
गर्गजी के शिशुगीतों को पढ़ते-सुनते समय लगता है जैसे वह बातचीत के लहजे में ही बहुत कुछ कह डालते हैंं उनके पास न शब्दों की कमी है और न शिल्प की। एक अद्भुत ध्वन्यात्मकता लिए उनका ये शिशुगीत देखिए- फुदक-फुदक कर नाची चिडि़या/चहल-पहल की चाची चिडि़या/लाई खबर सुबह की चिडि़या/ बात-बात में चहकी चिडि़या/अब आप जरा गौरैया,जो दुर्भाग्य से महानगरों में अब कहीं नहीं दीखती, पर एक नजर डालें, तो ये पूरा शिशुगीत आपके सामने जीवंत हो उठेगा। कितने कवि हैं जो चहल-चहल की चाची चिडि़या जैसा विरल प्रयोग कर सकेंगे।
बिल्ली-चूहे पर अनगिनत बाल कविताएं लिखी गई हैं, हिंदी में ही नहीं, अन्य देसी-विदेसी भाषाओं में  भी पर कुछ शिशुगीत ऐसे हैं जो अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं। गर्गजी का यह शिशुगीत  बिल्ली-चूहे की पारंपरिक दुशमनी से परे उनकी दोस्ती की राह खोलता है -बिल्ली-चूहा,  चूहा-बिल्ली/साथ-साथ जब पहुंचे दिल्ली/घूमे लालकिले तक पहले/फिर इंडिया गेट पर टहले/घूमा करते बने-ठने से/इसी तरह वे दोस्त बने से/ चूहे के कागज कुतरने की फितरत पर राही जी की भी एक बहुत ही प्यारी बालकविता है  -जिसकी दो चार पंक्तियां संदर्भवश यहां देख लीजिए - चढ़ा मेज कुर्सी पर मेरी/चीजें कुतर लगादी ढेरी/कई पुस्तकें रद्दी कर दीं/कई कापियां भददी करदीं/
अब देखे> कि ये चूहे तो कागज रद्दी तक ही सीमित रहे, पर आप इसे विनोद में लें तो आधुनिक कंप्यूटराइज्ड डिवाइस से संपन्न चूहे तो देश की अर्थव्यवस्था को ही कुतर कर सफा कर गए।
पारंपरिक बालकहानियों में राजा-रानी भरे पडे हैं पर गर्गजी के शिशुगीत में राजा-रानी थोड़ी अलग धज के हैं-राम नगर से आए राजा/श्याम नगर से रानी/ रानी रोटी सेंका करती/राजा भरते पानी। इन राजा रानियों का जबसे प्रीवी पर्स छिना तब से उनका यही हाल हो चुका है। गुड्डे-गुडि़यों पर भी अनेक बालकवियों ने कलम चलाई है पर गर्गजी की गुडिया तो अनोखी गुडि़या है जो बहुभाषी है और पीढि़या भी गुजर जाएं पर वह बुढि़या नहीं होती। देखिए -गुडि़या है आफत की पुड़िया/बोले हिंदी, कन्नड़, उडि़या/ नानी के संग भी खेली थी/किंतु अभी तक हुई न बुढि़या।
ये तो केवल चंद उदाहरण है। गर्गजी के अनेक बालकविता संग्रहों, यथा गीतों के रसगुल्ले, गीतों के इंद्रधुनष, नटखट गीत, भालू की हड़ताल, अक्षर गीत, मात्राओं के गीत, तीनों बंदर महा धुरंधर, शरारत का मौसम, यदि पेड़ों पर उगते पैसे, की सभी रचनाओं पर बात की जाए तो एक पूरी किताब बन जाए।
लेकिन एक बात तो तय है कि ऐसी बालकविताओं का आनंद लेने के लिए आपको शिशुमन होना पड़ेगा। क्योंकि बालसाहित्य  का सृजन-पठन-पाठन-और श्रवण आरोहण की न होकर अवरोहण की प्रक्रिया है। शिशुओं को आप हर परिवार में देख सकते हैं पर शिशुमन वाले सभी जगह नहीं होते। सूखी मिटटी पर पानी डालने का काम साहित्यकार, कलाकार करते हैं।
ऐसी संगोष्ठियों के बहाने आप बालसाहित्य को प्रोत्साहन देकर बालसाहित्यकारों का सम्मान कर रहे हैं,  यह हम सबके लिए गौरव की बात है। आपने मुझे गर्ग साहब की बालकविताओं पर अपने थोड़े-से विचार रखने का अवसर दिया इसके लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद, आभार!

रमेश तैलंग
(+91) 9211688748
(दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में 15-नवंबर, 2014 को आयोजितशेरजंग गर्ग की संपूर्ण बाल कविताएं (प्रकाशक-कितब घर, नई दिल्ली) के लोकार्पण के अवसर पर पढ़ा गया आलेख)