Wednesday, October 31, 2012

संवाद-१, संजीव जायसवाल 'संजय' के बाल उपन्यास 'डूबा हुआ किला' पर एक सह-संवाद


'डूबा हुआ किला' एन.बी.टी. द्वारा प्रकाशित मेरे इस उपन्यास का दो साल के भीतर चौथा संस्करण आ गया है. किशोर वर्ग के जिन पाठकों ने इसे इतना लोकप्रिय बनाया उनका मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूँ. 

Ramesh Tailang: यह बाल उपन्यास मैं पिछले दिनों दिल्ली पुस्तक मेले से लाया था. काफी रोचक है बस एक बात जरूर महसूस हुई कि अनेक बाल उपन्यासों में अपहरणकर्ताओं या अपराधकर्मियों का चरित्रों के रूप में आना , और उनसे बच्चों का अपने ढंग से जूझ कर बाहर निकल आना ट्रेंड न बन जाए. देवेन्द्र कुमार के दो बहुत ही अच्छे बाल उपन्यास हैं पेड़ नहीं कट रहे हैं, और अधूरा सिंहासन, प्रकाश मनु का 'गोलू भागा घर से, आदि में भी यह विषय वस्तु अंत में प्रकारांतर से सामने आती है. पिछले दिनों आर्शिया अली ने ज़ाकिर अली के वैज्ञानिक बाल उपन्यास 'समय के पार ' की बात कही थी. यह अपने ढंग का एक अच्छा बाल उपन्यास है पर उसमे भी मुझे न जाने क्यों एक बात कमजोर लगी- उपन्यास का किशोर नायक प्रकाश जब प्रोफ़ेसर की समय यान लैब में जाता है तो उसकी जेब में रखे पेन माइक्रो ट्रांसमीटर को कैसे अंदर जाने दिया गया. ऐसी लैब में सुरक्षा व्यवस्था इतनी अचूक होती है कि इस तरह के छोटे-मोटे उपकरण फिर चाहे वे अनजाने में ही ले जारहे हों, तत्काल पकड़ में आ जाते हैं... बच्चों की संवेदना और उनके मनोविज्ञान से सम्बंधित कुछ और बाल-किशोर उपन्यास आएं तो और अच्छा लगेगा. हरदर्शन सहगल का मान की घंटियाँ, प्रहलाद अग्रवाल का -पापा मुस्कराइए ना' इस तरह के उपन्यास हैं पर प्रहलाद जी का उपन्यास, जैसे कि डॉ. हरी कृष्ण देवसरे ने भी कहा था, बाल उपन्यास से थोड़ी ऊपर की चीज हो गया है. वह न तो वयस्क उपन्यास में रहा और न ही बाल उपन्यास में. एक बहुत ही छोटी-सी क्षीण रेखा है जो इन दोनों श्रेणियों को विभाजित करती है. रचनाकार को इस पर बड़ी ही सावधानी से चलना पड़ता है...हम सभी कोशिश करते हैं, पर चूकें करना हमारी कोशिशों का ही एक हिस्सा हैं. वैसे भी कोई रचना अपने आप में मुकम्मिल कभी नहीं होती....

Sanjeev Jaiswaal "Sanjay': मेरे उपन्यास 'डूबा हुआ किला' के चौथे संस्करण के प्रकाश पर आदरणीय रमेश तैलंग जी ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पड़ी अंकित की है:-

"यह बाल उपन्यास मैं पिछले दिनों दिल्ली पुस्तक मेले से लाया था. काफी रोचक है बस एक बात जरूर महसूस हुई कि अनेक बाल उपन्यासों में अपहरणकर्ताओं या अपराधकर्मियों का चरित्रों के रूप में आना , और उनसे बच्चों का अपने ढंग से जूझ कर बाहर निकल आना ट्रेंड न बन जाए. देवेन्द्र कुमार के दो बहुत ही अच्छे बाल उपन्यास हैं पेड़ नहीं कट रहे हैं, और अधूरा सिंहासन, प्रकाश मनु का 'गोलू भागा घर से, आदि में भी यह विषय वस्तु अंत में प्रकारांतर से सामने आती है. पिछले दिनों आर्शिया अली ने ज़ाकिर अली के वैज्ञानिक बाल उपन्यास 'समय के पार ' की बात कही थी. यह अपने ढंग का एक अच्छा बाल उपन्यास है पर उसमे भी मुझे न जाने क्यों एक बात कमजोर लगी- उपन्यास का किशोर नायक प्रकाश जब प्रोफ़ेसर की समय यान लैब में जाता है तो उसकी जेब में रखे पेन माइक्रो ट्रांसमीटर को कैसे अंदर जाने दिया गया. ऐसी लैब में सुरक्षा व्यवस्था इतनी अचूक होती है कि इस तरह के छोटे-मोटे उपकरण फिर चाहे वे अनजाने में ही ले जारहे हों, तत्काल पकड़ में आ जाते हैं... बच्चों की संवेदना और उनके मनोविज्ञान से सम्बंधित कुछ और बाल-किशोर उपन्यास आएं तो और अच्छा लगेगा. हरदर्शन सहगल का मान की घंटियाँ, प्रहलाद अग्रवाल का -पापा मुस्कराइए ना' इस तरह के उपन्यास हैं पर प्रहलाद जी का उपन्यास, जैसे कि डॉ. हरी कृष्ण देवसरे ने भी कहा था, बाल उपन्यास से थोड़ी ऊपर की चीज हो गया है. वह न तो वयस्क उपन्यास में रहा और न ही बाल उपन्यास में. एक बहुत ही छोटी-सी क्षीण रेखा है जो इन दोनों श्रेणियों को विभाजित करती है. रचनाकार को इस पर बड़ी ही सावधानी से चलना पड़ता है...हम सभी कोशिश करते हैं, पर चूकें करना हमारी कोशिशों का ही एक हिस्सा हैं. वैसे भी कोई रचना अपने आप में मुकम्मिल "

तैलंग जी उन चंद साहित्यकारों में ही जिन्होंने फेस बुक पर बहस को एक सार्थक दिशा दी है. इसके लिए वे सम्मान के पात्र है. मैं उनके उपरोक्त विचारों से पूर्ण रूप से सहमत हूँ. बाल उपन्यासों में अपहरणकर्ताओं या अपराधकर्मियों का चरित्रों के रूप मे आने का ट्रेंड बन जाना उचित नहीं है. लेकिन एक लेखक के रूप में कुछ मजबूरियां और सीमायें होती ही. ९९ % कथानकों का सन्देश बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाना होता ही. इसलिए अच्छे पात्रों के साथ साथ खल पात्र भी स्वाभाविक रूप से कथानक में आ जाते है. चाहे वो राजा रानी की कहानी हो या परियों की या फिर पौराणिक कहानियाँ हों. सबमें राक्षस, दुस्ट मंत्री या सेनापति आ ही जाते हैं. यही बात आधुनिक कथानकों में लागू होती ही और किसी न किसी रूप में खलनायक आ ही जाता ही. बस जरुरत इस बात की है की खल पात्रों को महिमा मंडित न किया जाए. मेरे इस उपन्यास में डाकू जरुर है लेकिन मैंने कोशिस की है कि पूरे उपन्यास में एक भी गोली न चले और हिंसा न हो. बच्चे अपनी समझ बूझ से न केवल खूंखार डाकुओं का समर्पण करवा देते है बल्कि खजाना भी सरकार को सौंप देते ही. वैसे रमेश जी ने जो कहा है अगले उपन्यासों में उसका ध्यान रखूँगा. वास्तव में अगर बच्चों के किसी उपन्यास में खल पात्र न आयें तो वो रचना श्रेष्ठ हो जायेगी. आशा ही दूसरे लेखक भी इस दिशा में प्रयास करेंगे. मार्गदर्शन के लिए रमेश तैलंग जी का धन्यवाद. वे वरिष्ठ है और इसी तरह हम लोगों को गाईड करते रहेंगे. आभार.

Ramesh Tailang: संजीव भाई, आपके स्पष्टीकरण की कोई जरूरत नहीं थी फिर भी आपका मेसेज मुझ तक ठीक-ठीक पहुंचा है. आपके एक और पुस्तक हवेली भी ले आया हूं पकाशन विभाग से कभी मौका मिला तो आपके पूरे कृतित्व पर लिखना चाहूंगा. दरअसल बुरे पर अच्छाई की विजय एक आदर्श सन्देश है जो उसी रूप में बच्चों के सामने आना चाहिए पर आज के इस खलनायकी जमाने में ऐसा नहीं भी होता है तो बच्चों को जुसे झेलने की भी हिम्मत होनी चाहिए, और एक दो पराजय से पूरे जीवन की विफलता को नहीं आंकना चाहिए. बहुत से विदेशी बाल उपन्यासों में इस यथार्थ की इस रूप में प्रस्तुति शुरू हो गई है. आखिर हर कथा सुखांत तो नहीं हो सकती...जीवन जिस तरह का है उससे उसी रूप में दो चार होना पड़ेगा ..सिर्फ वयस्कों को ही नहीं, बच्चों को भी. दंगों में बच्चे माता-पिता को खो देते हैं तो उसकी प्रतिक्रियास्वरुप उनके जिंदगी कौनसा नया मौद लेती है ...इसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रूपों में हो सकती है .... दरअसल मेरा पॉइंट ये था कि बाल उपन्यासों की कथावस्तु टाइप्ड न हो कर बच्चों की और समस्याओं से भी जुड़े तो उसका महत्त्व अलग ही होगा. ...शेष आप सभी योग्य लेखक हैं, मेरे खाते में तो चार अच्छी कहानियां भी नहीं है, उपन्यास तो बहुत दूर है. कोशिश जारी है...

Deven Mewari: तैलग जी ने बाल साहित्य के कुछ अच्छे पठनीय उपन्यासों के बारे में बताया है। इसके लिए उनका आभार। मैं जब भी बच्चों के लिए लिखी गई कहानियां या उपन्यास पढ़ता हूं तो पहले अपने बचपन में लौट कर किताब पकड़ता हूं तब पढ़ते-पढ़ते उसी बाल मन से कथा का आनंद उठाता हूं। मैंने संजीव जी का उपन्यास ‘डूबा हुआ किला’ भी इसी तरह पढ़ा और मन उन साहसी बच्चों की टोली में शामिल होने के लिए उछलता रहा। एक और बाल उपन्यास ने मेरा मन मोह लिया वह है नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित पंकज बिष्ट का ‘गोलू और भोलू’। उसमें एक बच्चे और भालू के बच्चे की कहानी कही गई है। उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते कहीं भी यह नहीं लगता कि वह कोई और प्राणी है बल्कि अपना ही दोस्त लगता है। बच्चा और भालू का बच्चा दोनों एक दूसरे की भावनाओं को पूरी तरह समझते हैं। साथियों से कहना चाहूंगा कि अगर ‘गोलू और भोलू’ न पढ़ा हो तो उसे जरूर पढ़ें

Bhairunlal Garg: भाई आप दोनों को हार्दिक बधाई !लेखक और समीक्षक का इस रूप में आना सुखद तो लगा ही ,इस विधा से जुड़े रचनाकारों के लिए भी यह मार्गदर्शक अवसर है.

DrZakir Ali Rajnish तैलंग जी एक गम्‍भीर पाठक भी है, और बाकायदा खरीद कर पढते हैं। उन्‍होने बाल उपन्‍यासों के संदर्भ में जो बातें कही हैं, उनपर गम्‍भीरता से विचार करने की आवश्‍यकता है

Omprakash Kashyap: संजीव जी ने जिस प्रकार खुले मन से बालउपन्यास पर इस आलोचनात्मक टिप्पणी को दिया है, यह दर्शाता है कि वे श्रेष्ठ रचनाकार ही नहीं, व्यक्ति भी बहुत अच्छे हैं. लेकिन उनकी यह टिप्पणी स्वीकारोक्ति कम स्पष्टीकरण अधिक लगती है. बुराई इसमें भी नहीं है. आखिर लेखक को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है. अगर अपने लिखे और सोच पर विश्वास न हो तो शायद कोई कलम ही नहीं उठाए. लेकिन उनका यह कथन— 'एक लेखक के रूप में कुछ मजबूरियां और सीमायें होती ही. ९९ % कथानकों का सन्देश बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाना होता ही. इसलिए अच्छे पात्रों के साथ साथ खल पात्र भी स्वाभाविक रूप से कथानक में आ जाते है...यही बात आधुनिक कथानकों में लागू होती है...' कहीं न कहीं आजकल लिखे जा रहे बालसाहित्य और उसकी सीमा की ओर संकेत करता है. मेरी निगाह में यह दृष्टिकोण कि बिना नायक—खलनायक के बालसाहित्य नहीं लिखा जा सकता, गलत है. यदि इस तरह के आंकड़े सचमुच 99 प्रतिशत हैं, तो मैं बेहिचक कहना चाहूंगा कि हमारे बालसाहित्यकार आज भी सामंती मानसिकता से बाहर नहीं आ पाए हैं. जिन दिनों नायक—खलनायक को केंद्र बनाकर रचनाएं लिखी जाती थीं, उन दिनों व्यक्ति के अपने विवेक का कोई स्थान नहीं था. उसे केवल आदेश मानना सिखाया जाता था. आज परिवेश बदला हुआ है. हम यह मानते हैं कि जीवन में न तो कोई पूरी तरह अच्छा होता है, न बुरा. लेखक का काम बालक में यह समझ पैदा करना है कि किसी व्यक्ति में कौन—सा गुण व्यापक समाज के हित में है और कौन सा अहितकारी. समाज सुधारक की जिम्मेदारी ओटना लेखक का काम नहीं है. साहित्य के माध्यम से उसकी जिम्मेदारी बस इतनी है कि वह बालक की निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाए. उसमें नीर—क्षीर में अंतर करने का विवेक पैदा करे. और यदि खलनायक कहानी में आता भी है तो लेखकीय सफलता इसमें है कि बालक जान ले कि खलनायक के स्वभाव में क्या अच्छाइयां थीं और कौन—सी बुराइयां....कि उसने अपनी अच्छाइयों को उपेक्षित कर, बुरे गुणों को आगे रखा, इस कारण वह खलनायक कहलाया. इसलिए कोई भी अच्छा व्यक्ति यदि अपनी अच्छाइयों की ओर से असावधान रहता है, बुराइयों की ओर से आंख मूंद लेता है तो उसके भी खलनायक में बदलते देर नहीं लगेगी.


Omprakash Kashyap यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है. इसपर विद्वानों के विचार आने चाहिए. निवेदन है कि इस विमर्श को तैलंग जी ब्लॉग पर ले जाएं. जो इसी उद्देश्य के लिए बनाया गया है

Sanjeev Jaiswal Sanjay: "लेकिन उनकी यह टिप्पणी स्वीकारोक्ति कम स्पष्टीकरण अधिक लगती है. बुराई इसमें भी नहीं है. " भाई ओमप्रकाश कश्यप जी का उक्त कथन बिलकुल सही है. अपनी बात रखते समय मेरे अवचेतन मान में कहीं न कहीं स्पस्टीकरण देने कि भावना जरुर थी. लेकिन मैने "खलनायक" शब्द का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप में किया था. मेरा आशय हर प्रकार की बुराई, नकारात्मकता  और अस्वाभाविकता से था. दरअसल हम जब भी अच्छाई की जीत कथानक में दिखाते हैं स्वाभाविक रूप में तुलनात्मकता के कारण बुराई का जिक्र सामने आ ही जाता है. आवश्यकता इस बात की है  जरुरत पड़ने पर रचनाकार 'नेगेटिव शेड' का प्रयौग दाल में नमक की  तरह करें वर्ना बच्चों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. जिस रचना में  'नेगेटिव शेड'  हीं होंगे वो बहुत उच्च कोटि की श्रेष्ठ रचना होगी.सभी लेखकों को इस दिशा में इमानदारी से प्रयास करना चाहिये. परिणाम निश्चत ही सुखद होंगे . "डूबा हुआ किला' लिखते समय मैंने इस बात की कोशीश  की थी कि डाकुओं की प्रष्ठभूमि  होने के बाद भी कथानक में हिंसा और भयावहता न आने पाए. मुझे लगता था की मुझे इसमें सफलता भी मिली  है लेकिन आज रमेश तैलंग जी की बात पढ़ने के बाद मुझे महसूस हो रहा है कि कथानक में काफी सुधार  किया जा सकता था. क्योंकि कोई भी रचना कभी भी अपने में सम्पूर्ण नहीं होती है. सूधार कि हमेशा गुंजाइश होती है. दुबारा लिख कर प्रकाशित करने की  परमपरा नहीं है वर्ना रमेश जी की शिकायत दूर करने कि कोशिश  करता. अपने अगले उपन्यास में कुछ और सावधानी बरतूँगा . "डूबा हुआ किला" बच्चों  को संकट में हिम्मत और सूझ बुझ से काम लेने, देश की धरोहरों को संरक्षित करने की  प्रेरणा देने और पुराने राजाओं को अपनी सामंती सोच को अब बदलने  प्रेरणा देता है. इस पूरे उपन्यास में डाकुओं द्वारा एक भी गोली नहीं चलायी गयी है और बच्चे उन्हे आत्मसमर्पण के लिए जिस तरह तेयार कर लेते है वो प्रेरणादायक हो सके ऐसी मैने कोशिश  की ही . अब कितनी सफलता मिल पाई है ये पाठक तय करेंगे. आदरणीय रमेश जी और ओम प्रकाश जी का आभारी हूँ जिन्होंने मार्गदर्शन किया ही है विश्वास है की वरिष्ट रचनाकारों का विश्वास भविष्य में अर्जित कर सकूंगा. धन्यवाद.

2 comments:

  1. तैलंग जी, इस सार्थक पहल के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

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  2. Bhai sahab...yah ek sarthak aur prashansaniya karya hai ise ham sabhi ko age badhana chahiye....

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