Monday, April 13, 2020

दो सखियाँ : नासिरा शर्मा










नासिरा शर्मा

अनेक शीर्ष पुरस्कारों से सम्मानित, वरिष्ठ कथालेखिका नासिरा शर्मा ने हिंदी साहित्य जगत को अनेक महत्वपूर्ण कृतियाँ दी हैं यथा - ठीकरे की मंगनी,पारिजात, मेरी प्रिय कहानियां, अजनबी जजीरा, पत्थर गली तथा औरत के लिए औरत. इन कृतियों के अलावा नासिरा जी ने बच्चों के लिए भी अनेक रोचक कहानियां लिखी हैं. उनके अनेक कहानियां बच्चों की श्रेष्ठ पत्रिकाओं जैसे नंदन,चकमक, में प्रकाशित होती रही है

आज प्रस्तुत है नासिरा जी की एक नई बाल कहानी-

दो सखियाँ
नासिरा शर्मा

गर्मी का मौसम था। पेड़ों का साया भी जानवरों को भा नहीं रहा था। आसपास
के ताल सूख गए थे। प्यास लगने पर वह जंगल से बाहर बहने वाली नदी पर पानी पीने
जाते थे। ऐसे मौसम में जंगल में रहने वाली हिरणी की तबियत ख़राब हो गई। दिन भर
झाड़ी के पास पड़ी हाँफती रहती। जहाँ घने पेड़ की छाया थी। उसकी चिन्ता अपने छौने
को लेकर थी। जो अभी पैदा हुआ था और ख़ुद से घास नहीं चर सकता था। दुश्मन के
आने पर वह छलाँगे मार दौड़ नहीं सकता था। उसकी टाँगे अभी नर्म और मुलायम थीं !
हिरणी को याद आया कि उसके बचपन की सखी कुछ दूर पर कटीली झाड़ियों
के उस पार रहती है। जब तक वह बीमार है। उसके छौने की देखभाल वह कर लेगी। ऐसा
सोच कर वह छौने को ले धीरे धीरे चलती हुई झाड़ियों के पास पहुँची और लगी सखी को
आवाज़ देने। जल्द ही थक गई और सुस्ताने के लिए वहीं ज़मीन पर बैठ इन्तज़ार करने
लगी। छौना आज पहली बार बाहर निकला था। उसको सब कुछ नया नया लग रहा था।
माँ प्यार से उसका बदन चाट रही थी। तभी झाड़ियों के पीछे से हिरणी की सखी आहू
गई और पुरानी सखी को घर आया देख खुश हो गई।
कैसी हो गज़ाल ?“ आहू ने पूछा।
बहुत बीमार ! गर्मी तो देख रही हो कैसी बला की पड़ रही है। जाने बारिश कब आयेगी
?“ गज़ाल ने जवाब दिया।
बादल आते हैं और चले जाते हैं।आहू बोली।
कुछ दिनों के लिए अगर तुम मेरे छौने को अपने पास रख लेतीं तो मैं कुछ दिन चैन से
सो सकती हूँ, बदन की थकान उतार आराम कर सकती हूँ।
ज़रूर, ज़रूर गज़ाल ! तुम बेफिक्र रहो।आहू ने छौने को प्यार से चाटा। यह देख गज़ाल
ने इत्तमिनान की साँस भरी और धीरे धीरे अपनी झाड़ की तरफ लौट पड़ी। उसका मन
सखी के इस बर्ताव से खुश था !

कुछ दिन गुज़र गए !
बारिश की छीटों ने मौसम की आग बुझा दी।

छोटे छोटे गड्ढे पानी से भर उठे। पेड़ों की पत्तियाँ नहा कर चमक उठीं। गज़ाल का जी
संभल गया ! उसे अपने छौने की याद आई !
ग़ज़ाल छौने की याद मन में बसाए झाड़ियों के पास पहुँची और बेचैन हो पुकार उठी -
आहू ... आहू !
वह जल्द से जल्द छौने को देखना चाहती थी। अब वह बड़ा हो गया होगा। उसके पैर लम्बे
और मज़बूत हो गए होंगे। उसने चरना सीख लिया होगा। मुझे देखते ही वह कुलाचें भर
मुझ से लिपट जायेगा।
कैसे आना हुआ गज़ाल“, आहू ने आकर सूखे स्वर में पूछा।
अपने छौने को लेने आई हूँ।गज़ाल ने सखी की ओर प्यार से देखा।
तुम्हारा छौना, यहाँ तो नहीं आया !कह कर आहू लापरवाही से वापस जाने लगी।
अरे भूल गईं ? मैं ख़ुद लेकर आई थी। गर्मी से मैं बीमार पड़ गई थी सो कुछ दिन तुम्हारे
पास छोड़ गई थी, याद आया ?“ ग़ज़ाल सखी की शरात जान हँस पड़ी।
तुम्हें ग़लतफहमी हुई है। मुझे तो याद नहीं।इतना कह आहू ने पैर से ज़मीन पर लकीरें
खींची तभी एक सुन्दर सा छौना उससे लिपट कर खड़ा हो गया। ग़ज़ाल ने उसे फौरन ही
पहचान लिया कि यह उसी के जिगर का टुकड़ा है। उसकी आँखें भर आईं। वह छौने को
चाटने आगे बढ़ी तभी आहू ने छौने को अन्दर जाने को कहा और झिड़क कर बोली।
बीमारी ने तुम्हारी मत मारी है। गर्मी दिमाग़ पर चढ़ गई है जो मेरे छौने को अपना छौना
बता रही हो। जाओ, यहाँ से फिर कभी इधर मत आना !आहू ने गुस्से में खुर पटके !
कैसी बातें कर रही हो सखी !ग़ज़ाल ने दुख भरे स्वर में कहा और बेहाल सी वहीं बैठ
गई। जाती भी कहाँ ? बच्चा लेने आई थी लेकर जायेगी। इसलिए थोड़ी थोड़ी देर बाद
पुकार उठती सखी ! मेरे छौने को मुझे लौटा दो। सखी मेरे साथ ऐसा मज़ाक मत करो, मैं
बेमौत मर जाऊँगी।

अन्दर पहुँच कर आहूने छौने को प्यार से चाटना शुरू कर दिया ! छौना भी दुलार से
अपना मुँह और बदन आहू के बदन से रगड़ने लगा।
तू मेरी आँखों का तारा है। तुझे मैं कैसे लौटा सकती हूँ ? तेरे बिना मैं जी नहीं पाऊँगी।
तू मुझे जब माँ पुकारता है तो मैं झूम झूम उठती हूँं। इस खुशी को गज़ाल स्वार्थी क्या
जानें ? ज़रा सी तबियत बिगड़ी तो अपनी औलाद दूसरे को दे डाली। अरे, मैंने कष्ट


उठाया। रात रात भर जाग कर छौने की देखभाल की है। उसकी परवरिश मैंने की है। उस
पर मेरा सिर्फ मेरा अधिकार है।आहू ने मन ही मन कहा।
जो ग़ज़ाल ने शोर मचाया। पंचायत बुलाई तो ?“ शंका उभरी !
उसकी बात पर कौन य़कीन करेगा ? पैदा होने के दो दिन बाद तो वह छौने को मुझे दे
गई थी।इतना सोच आहू ने आँखें बन्द की और गहरी नींद में डूब गई !

उधर गज़ाल की आँखों से नींद रूठ चुकी थी। न चाहने के बावजूद उसकी आँखों से आँसू
गिर रहे थे। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था कि क्यों उसने अपने छौने को अपने
से अलग कर सखी को दे दिया। उसकी सुन्दरता देख, उसकी नियत बदल गई। अब वह
कहाँ जाए, किस से न्याय माँगे। इसी सोच विचार में सुबह हो गई।

झाड़ियों के पीछे से छौनों का झुँड उछलता कूदता बाहर निकला। ग़ज़ाल ने
बेताब हो छौने को देखा और पुकार उठी। तभी गुस्से से भरी आहू पहुँच गई और चीख कर
बोली।
तुम फिर आ गई ?“
मैं गई कहाँ थी ? मुझे मेरा छौना चाहिए। मैं उसे लेकर ही यहाँ से जाऊँगी। तुम मेरे साथ
धोखा नहीं कर सकती हो।गज़ाल के तेवर पर बल पड़ गए।
तो क्या कर लोगी ? कोई सबूत है तुम्हारे पास कि यह छौना तुम्हारा है ?“ आहू चीखी।
हाँ ! इसको मैंने जन्म दिया है। जन्म के समय मेरी चीखों को सुन कर दोनों ख़रगोश अपने
बिलों से निकल आए थे और बन्दर भी डाल से कूद मेरे पास आन बैठा था। वे तीनों गवाही
देंगे।गज़ाल रुहाँसी हो बोली !
कहाँ रहती हो ? दोनों खरगोश्या कब के शिकार हो गये और बन्दर सड़ा सेब खाने से मर
गया है। तीनों ज़िन्दा नहीं हैं।कह कर आहू ज़ोर ज़ोर हँसने लगी। उसकी हँसी देख
गज़ाल को अपनी बेबसी का अहसास हुआ और वह सुबक सुबक कर रोने लगी। उसको यूँ
रोता देख पहले तो आहू घबराई फिर डपटकर बोली।
अपने घर जाओ ! सुबह सुबह आ हमारा रास्ता खोटा मत करो।कहती हुई आहू आगे बढ़
गई। मजबूर सी ग़जाल कुछ पल खड़ी रही फिर टूटे मन से वापस लौटने लगी। निराशा
से वह टूट चुकी थीं उसे अपने छौने की वापसी की अब कोई आशा दूर दूर तक नज़र नहीं
आ रही थी ! वह निढ़ाल सी जाकर अपनी झाड़ के पास बैठ गई।


एक दिन और गुज़र गया।
हिरणी ने कुछ नहीं खाया। भूख प्यास जो मरी सो मरी साथ ही उम्मीद भी मर गई।
ख़रगोश और बन्दर उसके पुराने पड़ोसी थे। कहने को तो पूरा जंगल उसे जानता है मगर
छौने की बात तो वही तीनों जानते थे।
एक दिन और गुज़र गया।
हिरणी ने कुछ खाया पिया नहीं। बस आँखों के सामने छौने की छबि बार बार उभरती थी।
आह भर कर रह जाती।
सखी पर भरोसा कर बहुत बुरा किया !

उसका कहा जुम्ला जंगल की हवा अपने साथ चारों तरफ ले जाने लगी। कुछ

देर बाद यही एक वाक्य सरसराता हुआ पूरे जंगल में डोलने लगा :
सखी पर भरोसा कर बहुत बुरा किया !

जानवरों में से बहुतों ने सुना अनसुना कर दिया मगर बहुतों ने ध्यान से सुना
और सोचा कि यह किसके मन की पीड़ा है ? बूढ़ी शेरनी ने सुना तो वह ठिठकी। हवा जब
बार बार यही सन्देशा देने लगी तो उससे रहा नहीं गया और वह आदत से मजबूर हो जंगल
की खैर खबर लेने पहुँच गई।

घने पेड़ों और झाड़ियों से गुज़र, मैदान पार कर जब पहाड़ियों की तरफ मुड़ी तो
उसे वह आवाज़ साफ सुनाई देने लगी। कुछ दूर और चली तो उसने माँद के सामने गज़ाल
को बैठा देखा जो हाल से बेहाल पड़ी, ठंडी आहें भर रही थी ! शेरनी पास पहुँची और उसने
आदत के मुताबिक आगे के पैर उठा ताली बजाई। जबसे उसने अदालत लगानी शुरू कर
दी थी तब से उसने गुर्राना और चिंघाड़ना बन्द कर दिया था। दाँत भी गिर गए थे। तेज
पंजों के नाखून भी घिस चुके थे। उससे जानवरों ने डरना बन्द कर दिया था। और आदर
करना शुरू कर दिया था। ताली की आवाज़ सुन ग़ज़ाल चौंकी। अपने सामने बूढ़ी शेरनी
को खड़ा देख वह अपने को रोक न पाई और उसके पास पहुँच फूट फूट कर रोने लगी।
अपना दुख बयान करो। यूँ रोने से मुश्किल हल नहीं होगी।शेरनी के कहने से हिरणी ने
अपनी सारी बिपदा कह सुनाई और अन्त में अपनी कठिनाई भी कह सुनाई कि उसके पास
छौने को वहाँ रखने का न कोई सबूत है और न गवाह !
उसकी बात सुन शेरनी मुस्कुराई दोस्ती गवाहऔर सबूतनहीं मांगती है। वह केवल
एतबार चाहती है। तुम्हारे साथ धोखा हुआ है। तुम कल अदालत आओ। पंचायत तुम्हारी
इस गिरहको खोलेगी।


इतना कह कर बूढ़ी शेरनी चली गई। गज़ाल ने अपना माथा पीटा।
मुसीबत के वक़्त अक़ल भी काम नहीं करती है। मुझे पंचायत का ख़्याल ही नहीं आया !

सुबह सूरज की नारंजी किरणों ने पूरे जंगल को सुनहरा बना दिया तब गज़ाल
माँद से निकली। वह सारी रात सोई नहीं थी। चाल में ढीलापन था। मन बुझा बुझा सा था।
जब वह पंचायत की गली में मुड़ी तो देखा आहूभी छौने के साथ आगे आगे जा रही है।
उसका दिल धड़क उठा। उसने अपनी चाल तेज़ कर दी।

अदालत का पंचायती मैदान जानवरों से भरा था। बूढ़ी शेरनी के दायें बायें बूढ़ी
भेड़नी, लोमड़ी, उकाब और अजगर बैठे हुए थे। मादाएँ ज़्यादा थीं। बूढ़ी शेरनी ने कार्रवाई
शुरू की और दोनों हिरणियों ने अपनी अपनी कह सुनाई। जो हिरण हिरणी वहाँ मौजूद थे।
उनके भी समझ में नहीं आया कि असली माँ की पहचान कैसे होगी। छौना तो आहू के साथ
है और गज़ाला को कभी किसी ने छौने के साथ जंगल में घूमते देखा नहीं और दोनों दावा
कर रही हैं कि छौना उनका है !

कुछ देर सन्नाटा छाया रहा। पंचों ने आपसी सलाह-मशविरा कर कहा कि दोनों
माआएं कल नदी की तेज धार वाले किनारे पर छौने के साथ पहुँचें। वहीं पर फैसला सुनाया
जायेगा। सभा बरख़ास्त हुई और जानवर आपस में बातें करते अपनी अपनी दिशा की तरफ
बढ़ने लगे। उन्हें पंचों पर विश्वास तो था मगर समझ नहीं पा रहे थे कि फैसला कैसे होगा।
भोर के समय झरने किनारे सब जमा थे। छौना भी आहू के साथ खड़ा था। बूढ़ी

शेरनी ने ताली बजा कर सबको ख़ामोश किया और गला साफ कर बोली।
छौने को उठा कर बहते झरने की तेज धार में फेंक दिया जाए।सुन कर ऐसा सन्नाटा
छाया कि लगा जंगल में कोई रहता ही नहीं है। जब वही हुक्म दोबार दोहराया गया तो
पास की डाल पर बैठा जवान बन्दर उतरा और छौनेको उठा, उसने बहते पानी में फेंका।
यह देख सब जम से गये। सब की साँसें थम सी गईं मगर गज़ाल बेचैन हो उठी और बहते
छौने के साथ नदी के किनारे-किनारे दीवानी हो दौड़ने लगी। उसकी आँखों से पानी बह
रहा था ! सब ने देखा :
आहू चुपचाप बैठी थी।
गज़ाल दौड़ रही थी।
कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था कि छौने का क्या होगा।


जब बेताब हिरणी बहते पानी में छौने को बचाने कूदने लगी तो बूढ़ी शेरनी की आवाज़
गूँजी !
छौने को बाहर निकाला जाए।

सुनते ही जवान चीते नदी में कूदे और छौने को गर्दन से पकड़ बाहर निकाल

लाए। आहूछौने के पास जाने लगी तो बूढ़ी लोमड़ी डपट पड़ी, ‘खबरदार !

बैठे हुए जानवरों में खलबली मच गई। आहू सहम कर पीछे हटी। सब फैसला
सुनना चाह रहे थे। गज़ाल छौने के बाहर निकाले जाने से ख़ुश थी। एक तरफ चुपचाप
खड़ीं मन ही मन प्रार्थना कर रही थी।
मेरा छौना बाहर सही सलामत निकल आया। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।इतना सोच वह
जाने लगी। उसे जाता देख आहू मुस्कुराई। उसको अब यक़ीन हो चला था कि फैसला
उसके हक़ में होगा। उसी को क्यों सभी को लग रहा था कि छौना आहू को मिलेगा। आहू
ही छौने की माँ है। परन्तु फैसला कुछ और हुआ।
छौना गज़ाल को दिया जाता है क्योंकि गज़ाल ही छौने की असली माँ है। पंचों का यही
फैसला है।बूढ़ी शेरनी की आवाज़ गूँजी।

एक बार फिर सबकी साँसें थम गईं। आहू के चेहरे का रंग उड़ गया। आँखें डबडबा
आईं और उसने सर झुका लिया। गज़ाल छौने के पास आई तो छौना माँ से लिपटने लगा।
उसे याद आया जब वह पानी की धार में बहाव के बीच डूब रहा था माँ, माँ पुकार कर रो रहा
था तब यही उसके संग दौड़ती रोती साथ साथ भाग रही थीं। उस ने भी असली माँ को पहचान
लिया था।

आज पूरे चाँद की रात थी।
हवा में ठंडक बसी थी। चांदनी सारे जंगल पर छिटकी थी !
गज़ाल को ऐसी ही रात का इन्तज़ार था, जब छौना समझदार हो जाए तो वह उसको
कहानी सुनाए।
सच्ची कहानी !
सच्ची मगर दर्द भरी कहानी।
जब छौना उसके पास आकर लेटा तो गज़ाल उसे चाटने लगी, आज वह छौने के रोज़ पूछे
जाने वाले सवाल कि माँ मेरे बाबा कहाँ है? उससे पहले ही जवाब देने लगी।


वह ऐसी ही चाँदनी रात थी बेटे ! जब शिकारी की बन्दूक से निकली गोली तेरे बाबा को
लगी थी। दूसरी गोली मेरे पास से सनसनाती गुज़री थी।
फिर माँ ?“ छौना का दिल धुकधुक करने लगा। बड़ी बड़ी आँखों में भय उभरा।
दूसरे दिन जब मैं तेरे बाबा को ढूँढने पहुँची तो वहाँ केवल उनके बदन से टपका खून पड़ा
थां जो ताज़ा और गर्म था। वह जख्मी थे। उन्हें ढूँढ कर वे शिकारी ले गये।
तुमने कैसे जाना ?“
वहाँ पहियों के निशान थे। जख़्मी होकर वह कुछ दूर दौड़े होंगे। मैं आगे निकल गई वह
पीछे रह गयें मेरे पेट में तू था। मुझे तुझे बचाना था। यही एक बात वह मुझसे बार बार कह
रहे थे। मैं मजबूर हो गई और ...
आदमी शिकार क्यों करते हैं ? हम तो उनको नहीं मारते ?“ छौने का सवाल सुन चाँद
कहकहा मार कर हँस पड़ा। चाँदनी गहरी हो गई।
पता नहीं, अब तो उनके पास पेट की आग बुझाने के लिए तरह तरह के अनाज और फल
हैं मगर पुरानी आदत नहीं छोड़ते।गज़ाल ने कहा।
उन्हें छोड़ना पड़ेगा माँ ! जीने का हक़ सबको है।छौने को क्रोध आ गया था। उसकी
बात सुन कर ... इस बार चाँद पहले से भी ज्यादा जोर से हँसा। चाँदनी पहले से ज़्यादा
शीतल हो उठी तो गज़ाल ने झुरझुरी सी ली और बिना जवाब दिये झाड़ियों की ओट में
चली गई। छौना भी माँ के पीछे गया। जंगल रुपहला हो उठा था।
चाँद का हँसना जारी था।
उस रुपहली चाँदनी में चाँद के अलावा किसी ने नहीं देखा।
आहू चुपचाप माँद के पास आकर बैठ गई थी !

Saturday, April 11, 2020

घर कब आएगा?

आज इस पृष्ठ पर पढ़िए  सुप्रसिद्ध पत्रकार, संपादक, कालमनिस्ट, एवं बालसाहित्यकार पंकज चतुर्वेदी  की अपनेसमय से जुडी एक मार्मिक बाल कहानी  - घर कब आएगा?

पंकज चतुर्वेदी  
जहां ईद के दिन नमाज पढ़ने अब्बू के साथ आए थे, वहीं  टैंट के नीचे एक पलंग है, उस पर गद्दा । ना कोई बर्तन हैं ना कपड़े बचे। खाने को भी सुबह-शाम लाईन में लगना होता है। जब अम्मी हाथ बढ़ा कर खाना लेती है तो हर बार पहले मुझे देखती है, फिर आंख से बहते आंसू को दुपट्टे से पोंछती है। उसके बाद खाना ले कर आगे आ जाती है। पहले मुझे खिलाती है फिर जो बचा तो खा लिया।
“रोज-रोज ये चावल-पुलाव। अम्मी और कुछ नहीं है क्या खाने को?’’  परसो जब कहा तो अम्मी बहुत जोर से रोने लगी। बगल के पलंग की सभी औरतें आ गईं, उन्हे चुप कराने।  उसके बाद मैनें भी खाने को मांगा नहीं। अब्बू सामने वाले टैंट में हैं। वहां केवल मर्द ही हैं।
ये कितनी बुरी जगह है? अपना घर कितना अच्छा है ना ! बाहर चबूतरे पर बैठ जाओे तो कोई ना कोई सलाम-नमस्ते करता निकलता। कोई सिर पर हाथ फेर देता । और बगल वाले रमेश  चाचू तो हर समय कहते रहते, ‘रेशमा , आ जा। देख तेरे लिए क्या बनाया है चाची ने तेरी।’’ 
उस शाम राकेश , कामिल, उबेदा सभी के साथ गली में खेलते रहे। अब्बू काम से लौटे, साथ में खाना खाया और सो गए। अभी नीद  लगी ही थी कि अब्बू ने जगा दिया, ‘चुपचाप छत पर चलो। मुंह से आवाज मत निकालना।’ 
बाहर से बहुत हल्ला आ रहा था। लग रहा था कि कोई पत्थर फैंक रहा है। लोगों के भागने की, चीखने-चिल्लाने आवाजें। समझ नहीं आ रहा था। उस समय नींद से उठने का मन नहीं था। पर क्या करती अब्बू गुस्से में थे। 
आगे अब्बू, बीच में मैं और पीछे अम्मी। छत पर पहुंचे तो दूसरी तरह रमेश  चाचा खड़े थे। ‘‘ संभल कर  आना। देखो, किसी को खबर ना लगे।’’
हम सभी एक-एक कर रमेश चाचा की छत पर आ गए और वहां से उनके घर में। 
‘‘चाचू हमे उपर से क्यों बुलाया? वो भी इतनी रात में ? कोई दावत है क्या?’’
‘‘ कोई बात नहीं है। तुम अभी सो जाओ। कल बताते हैं।’’ यह कह कर रमेश  चाचा बाहर निकल गए।‘‘ भाईजान आप भीतर ही रहना। मैं संभाल लूंगा बाहर।’’
फिर सारी रात नींद तो आई नहीं। बाहर कभी धड़ाम की आवाज आती तो कभी धाएं-धाएं की। जोर का हल्ला होता और अम्मी मुझे अपने गोद में दुबका लेती। चाची को भी नींद नहीं आ रही थी। बस वो अम्मी को एक ही बात कहतीं, ‘‘भाभी, आप सो जाओ। हम हैं ना यहां। कोई चिंता मत करो।’’ 
रशीदा  बहुत देर तक यहीं सुनती रही, समझ में तो कुछ आ नहीं रहा था। पता ही नहीं चला कि कब नींद लग गई। एक बार फिर अब्बू ने जगाया, ‘बेटा जल्दी से उठो। हमें यहां से निकलना है।’’
आधी नींद की मारी रशीदा  कुनमुनाई, ‘‘अब्बू , आप चले जाओ। मैं तो यहीं रमेश  चाचू के घर रह लूंगी।’’
अब्बू ने रशीदा  को ऐसे ही गोद में झपट लिया और गली के बाहर की तरफ दौड़ लगा दी। पीछे-पीछे अम्मी थीं और दूर चाचा और चाची अपने घर के चबूतरे पर। रशीदा  ने पूरीं आंखें खोल कर देखा तो  उनके चारों तरफ हरी सी वर्दी वाले बंदूक लिए सिपाही थे। सभी लोग गली के बाहर खड़ी एक बस में बैठ गए। उसमें कई और लोग थे जो रो रहे थे। 
बस सभी को ले कर ईदगाह आ गई। सामने खुला मैदान, जमीन पर बिछे गद्दे और लोगों को चिल्लपो। सुबह हो गई थी। ईदगाह का दरवाजा बंद कर दिया गया और चारों तरफ बस पुलिस ही पुलिस। रशीदा  के लिए यह सबकुछ बहुत अलग सा था। लेकिन उधर अब्बू भी रो रहे थे और इधर अम्मी भी, वह किसी से कुछ बोल नहीं पाई। 
दिन तक कुछ खाना आया। कुछ लोगों ने बिस्किुट बांट दिए। शाम  होते-होते कुछ और बच्चे मैदान में खेलने लगे। उसने भी सोचा कि वह खेले लेकिन उसे अपने गली का कोई भी बच्चा नहीं दिखा। रमेश चाचू भी नहीं दिखे।  वह गुमसुम सी अपनी अम्मी के पास बैठ गई और धीरे-धीरे उसे नींद ने घेर लिया। 
पानी की बूंदों ने रशीदा  की नींद तोड़ दी। हड़बड़ा कर उठी तो देखा बरसात हो रही है।  टैंट में पानी टपक रहा है। गद्दे गीले ना हों इस लिए अम्मी और सभी औरतें उन्हें हाथ में लिए खड़ी हैं।  एक रात फिर जाग कर निकली।  कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे और उन्हें बदलने के लिए दूसरे कपड़े थे ही नहीं।  सूरज निकला तो कुछ लोग बड़े-बड़े बक्से वहां ले कर आए। उनमें कपड़े भरे थे। औरतें अपने नाप के कपड़ों के लिए उस पर टूट पड़ीं। जिसके हाथ जो लग रहा था, उठा रहा था, उसके नाप का ना हेता तो फिर फैंक देतीं।  कुछ देर में अम्मी कपड़े ले कर आती दिखीं । टैंट के बने गुसलखाने में गीले कपड़े उतार कर दूसरे पहने तो वह एक फ्रॉक थी। घुटनों से नीची, काले रंग की।  
दिन चढ़ रहा था, अब इस टैंट की बस्ती में पलंग आ रहे थे। टैंट पर पॉलीथीन की परत बिछाई जा रही थी।  डॉक्टर भी आ गए थे। कुछ लोग किताबें बांट रहे थे।  बच्चे मैदान में खेलने लगे। 
एक सरीखा सारा दिन बीतता। रशीदा  को अपने दोस्तों की याद आ रही थी, रमेश  चाचा की भी। अम्मी से जब कहती ‘हम कब लौटेंगे घर?’
हर बार एक ही जवाब होता ‘‘अल्लाह जाने!’’ अब्बू से भी पूछती तो वह भी यही कहते।
 ‘काश ,अल्लाह जल्दी से चाह ले। मैं अपने घर लौट जाऊं।’ दिल ही दिल दुआ मांगती। 
कई दिन बीत गए। अब्बू दिनभर पुलिसवालों के साथ, वकीलों के साथ, कागज भरते रहते । अम्मी टैंट की दूसरी औरतों के साथ बातें करतीं और रोती रहतीं। 
ना जाने कितने दिन बीत गए इसी उम्मीद में कि आज तो अपने घर लौटेंगे। लगा आज वह दिन आ गया। बड़ी हलचल है पूरे मैदान में। सभी अपना-अपना सामान बांध रहे हैं। बाहर लाउड स्पीकर पर कुछ ऐलान हो रहा है। आधा समझ नहीं आ रहा ,‘‘..... खतरनाक बीमारी है। एक साथ रहने से फैलती है। अभी सभी को यह कैंप खाली करना होगा।’’
अब्बू भी चिंतित दिख रहे हैं और अम्मी हर दिन की तरह बस आंसू बहा रही हैं। रशीदा  सोच रही है, ‘‘आज उसकी ऊपर वाले ने सुन ली। अब तो अपनी गली में अपने घर में --’’
कुछ ही देर में फिर से ये लोग बस में थे। वही हरी वर्दी वाले बंदूकें लिए। बस सड़क पर निकली। घर की गली के रास्ते के सामने जैसे ही पहुंची, रशीदा  उछल पड़ी, ‘यहां रोक देना। हम यहीं उतरेंगे।’’ 
जैसे किसी ने उसकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया। बस आगे निकल चुकी थी। 
‘‘यूपी का बार्डर आ गया है।  बस यहीं तक जाएगी।’’  एक सिपाही ने बोला। 
बस रूकी  और सभी लोग नीचे उतरे। ‘‘लेकिन हमारा घर तो पीछे छूट गया?’’ 
इतने दिनों में पहली बार रोई रशीदा ।
 ‘‘अब वो हमारा घर नहीं रहा। हम अपने अब्बू के गांव जा रहे हैं। अब हमारा घर वहीं होगा। फिर आगे ऊपर वाला जहां ले जाए।’’ अम्मी ने लगभग हाथ खींचते हुए बोला। रशीदा घिसटते हुए एक ऐसे रास्ते पर जा रही थी जहां उसे लगता है कि वहां उसका घर नहीं हैं।

Friday, April 10, 2020

जेम्स थरबर की कहानी : मुझे चांद चाहिए


जेम्स थर्बर

8 दिसंबर, 1894, को कोलंबस-ऑहियो में जन्मे जेम्स थर्बर सुविख्यात अमेरिकन लेखक, व्यंग्यकार और विनोदप्रिय व्यक्ति थे. उनको जितनी ख्याति अपनी कहानियों से मिली उससे कहीं ज्यादा यश उन्हें अपने कार्टूनों के ज़रिये मिला. थर्बर के माती-पिता ने उनके लेखन को बहुत प्रभावित किया. थर्बर के पिता जहाँ एक और अच्छा वकील या अभिनेता बन्ने का सपना पाले थे, वहीं दूसरी और थर्बर अपनी माँ को दुनिया की सबसे बेहतरीन कामेडियन मानते थे. थर्बर  की प्रमुख रचनाओं में ‘माय लाइफ एंड हार्ड टाइम्स, तथा माय वर्ल्ड एंड वेलकम टू इट अग्रणी हैं.प्रस्तुत कहानी मुझे चाँद चाहिए उनकी मशहूर चित्रकथा ‘मैनी मून्स’ का रूपांतर है जो अंग्रेजी मी काफी लोकप्रिय हो चुकी और उस पर नाटक/ओपेरा भी खेले जा चुके हैं.थर्बर का निधन : 2 नवम्बर, 1961 को न्यूयॉर्क सिटी में हुआ.

विश्व बाल साहित्य में आज पढ़िए -

जेम्स थरबर की कहानी : मुझे चांद चाहिए 
हिंदी रूपांतर : देवेन्द्र कुमार + रमेश तैलंग 

सागर के पास एक शहर बसा था – भव्य और सुंदर. वहां के राजा की बेटी का नाम था लीनोर. सब कुछ ठीक चल रहा था . राजा अपनी बेटी के सुंदर भविष्य के सपने देख रहा था. वह चाहता था कि दुनिया की हर ख़ुशी लीनोर को मिल जाए. और यह कुछ असंभव भी नहीं था. क्योंकि राजा के खजाने में इतना धन था कि उससे दुनिया की हर चीज खरीदी जा सकती थी. राजकुमारी लीनोर जैसे ही किसी चीज की फरमाइश करती, राजा उसे झटपट मंगवा देता.

राजा अपने जरूरी राजकाज में व्यस्त था, तभी उसे खबर मिली-लीनोर की तबीयत ठीक नहीं है. बात की बात में वहां राजवैद्य आ पहुंचा. उसने राजकुमारी की नब्ज़ टटोली, जीभ दिखाने को कहा, फिर दवा देकर बोला –“कोई चिंता  नहीं, राजकुमारी की तबीयत जल्दी ही ठीक हो जाएगी.

राजवैद्य की बात से राजा की चिंता कम हुई. वह कुछ देर तक लीनोर के पास बैठा. उसका माथा सहलाता रहा, फिर शांत मन से बाहर चला गया. वह एक बड़े राज्य का मालिक था. वह सदा ही व्यस्त रहता था.

लेकिन राजवैद्य की दवा का असर न हुआ. राजकुमारी ने भोजन नहीं किया, चुपचाप अपने पलंग पर लेटी  हुई खिड़की से बाहर देखती रही. उसका चेहरा उदास था. राजा परेशान हो गया. उसने लीनोर से पूछा-‘बेटी, क्या बात है? क्या तुम्हें कोई ऐसी चीज चाहिए जो आजतक न मिली हो. मुझे बताओ. मैं तुरंत मंगवा दूंगा चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो.

लेनोर चुप-चाप लेटी  रही. वह कुछ सोच रही थी. उसने पिता से कहा – ‘हाँ, मुझे वह चाहिए जो रात में दिखाई देता है.’

राजा कुछ समझ न पाया. वह सोच-सोचकर परेशान हो गया. रात हुई, वह लीनोर के पास गया. बोला –‘बेटी, बताओ वह क्या चीज है?’

लीनोर ने खुली खिड़की से दिखाई देते चांद की और इशारा करके कहा –‘मुझे चांद चाहिए.’

राजा ने काले आकाश में चम-चम चमकते चांद को टकटकी लगाकर देखा और देर तक देखता रहा फिर लीनोर से बोला-‘बेटी, मैं तुम्हारे लिए जल्दी ही चांद मंगवा दूंगा. मेरे मंत्री और दरबारी बहुत चतुर हैं. राज्य में एक से बढ़कर एक विद्वान् और जादूगर हैं. समझो की चांद मिल गया. जल्दी ही तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाएगी. अब चिंता छोडो और आराम से सो जाओ.’

आज तक राजकुमारी की हर इच्छा पूरी की गई थी. उसे विश्वास था कि चांद जल्दी ही उसे मिल जाएगा. उसने आँखें मूँद लीं और नींद ने उसे अपनी गोदी में ले लिया.

लेकिन राजा को उस रात नींद नहीं आई. वह सोचता रहा कि  बेटी के लिए आकाश के चांद को धरती पर कैसे लाया जा सकता है. उसने तुरंत मंत्री को बुलवा भेजा, जो घबराता, दौड़ता-भागता चला आया. वह डर रहा था कि आधी रात को बुलावा क्यों? ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था. राजा ने कहा-‘राजकुमारी को आकाश का चांद चाहिए. तुरंत लाने की व्यवस्था करो.”

सुनकर मंत्री के होश उड़ गए. वह सोचने लगा –‘आखिर यह कैसी मांग है. आज तक उसने राजा की हर मांग को पूरा किया था, फिर चाहे वह कितनी भी कठिन और बेहूदी क्यों न रही हो. उसने डरते-डरते कहा –‘महाराज, चांदमिलना कितना कठिन है. क्योंकि वह धरती से बहुत दूर आकाश में रहता है और आकार में बहुत बड़ा. धरती से आकाश की यात्रा आज तक किसी ने नहीं की. पहला कठिन काम वहां जाना, तथा दूसरी मुश्किल समस्या- चांदको धरती लाना. आज जीवन में पहली बार मुझे कहना पड़ रहा है कि यह काम मुश्किल ही नहीं, असंभव है.’

राजा को इस तरह की बात सुनना पसंद नहीं था. सच तो यह था कि आज तक उसने किसी के मुंह से ‘न’ नहीं सुना था. उसने क्रोधित स्वर में कहा-‘मूर्ख, नासमझ! अभी निकल जाओ यहां से और राज्य के बुद्धिमान दरबारी को भेज दो. बुद्धिमान दरबारी का एक विशेष पद था जिसे हर कोई सम्मान की दृष्टि से देखता था.

बुद्धिमान दरबारी को मंत्री ने पहले ही पूरी बात बता दी थी. पर वह  भी बहुत घबराया हुआ था. राजा की मांग सुनकर वह कुछ देर तक सोचता रहा. फिर बोला –‘महाराज की जय हो. आजतक मैंने  आपका हर हुक्म बजाया है. इस धरती पर ऐसी कोई चीज नहीं जो मैंने आपके मांगने पर लाकर न दी हो. लेकिन चांद तो आकाश में तैरता है. वह आकार में बहुत ऐडा है. इससे पहले धरती पर किसी ने चांदकी मांग नहीं की है, फिर आज....

राजा ने उसकी बात काटते हुए कहा-‘मेरी बेटी को चांद चाहिए. उसकी मांग पूरी होनी ही चाहिए.’

‘महाराज, चांद धरती से हजारों-लाखों मील दूर है. उसे धरती पर नहीं लाया जा सकता. यह कहने के लिए आप जो भी दंड देंगे मुझे स्वीकार है पर मैं आपको भ्रम में  नहीं रखना चाहता. यह असंभव है.’

राजा ने बुद्धिमान दरबारी को भी कमरे से भगा दिया. वह सोच रहा था –‘क्या सचमुच इन लोगों की बात ठीक है कि चांद को धरती पर नहीं लाया जा सकता. तब राजकुमारी की मांग पूरी करने  का और क्या उपाय है?’ राजा देर तक कमरे में चहलकदमी करता रहा. खिड़की से आकाश में चमकता चांददिखाई दे रहा था. एकाएक उसे दरबार का विदूषक याद आया. विदूषक अपनी लच्छेदार बातों से राजा का मन बहलाया करता था. वह बहुत हाजिर जवाब था.. राजा प्रसन्न हो कर उसे अक्सर

इनाम दिया करता था. इससे राज्य के बड़े अधिकारी विदूषक से ईर्ष्या करते थे. सोचते थे-‘ वह राजा को मूर्ख बनाकर अपना काम निकालता है.’ पर ऐसा नहीं था. विदूषक सचमुच विद्वान था.

राजा ने विदूषक को बुला भेजा. विदूषक आया और राजा को नमस्कार करके चुप खड़ा हो गया. उसे पता था की राजा क्या कहेगा.

राजा ने उसे बता दिया कि  मंत्री और बुद्धिमान दरबारी ने क्या कहा था.

विदूषक बोला-‘महाराज, वे विद्वान् और बुद्धिमान लोग हैं. चांदके बारे में उन लोगों ने जो कुछ कहा है, वह ठीक ही होना चाहिए. यह परम सत्य है कि चांद धरती से लाखों मील दूर आकाश में है, बहुत विशाल है. पर हमें यह पता करना चाहिए कि चांद के बारे में राजकुमारी जी के क्या विचार हैं. अगर हम यह जान सकें तो शायद कोई बात बन जाए.’

‘अरे, यह बात तो मैंने कभी सोची ही नहीं.’ राजा ने कहा.

विदूषक बोला –‘मैं राजकुमारी जी के पास जाकर चांद के बारे में बात करता हूँ.’

विदूषक राजकुमारी लीनोर के पास जा पहुंचा. उसे देखते ही लीनोर ने पूछा-‘क्या तुम चांद  लेकर आये हो?’

‘अभी तो नहीं लाया, पर जल्दी ही ले आऊँगा’, विदूषक ने कहा. यह तो बताइए, चांदकितना बड़ा है?’

राजकुमारी मुस्कराई. अपने अंगूठे का नाखून दिखाकर बोली-‘इस नाखून से थोडा छोटा है चांद क्योंकि जब मैं अंगूठे को आँख के सामने करती है तो चांद छिप जाता है.’

विदूषक मुस्कराया . उसने पूछा-‘भला यह तो बताइए, चांद यहां से कितनी दूर होगा?’

राजकुमारी ने खिड़की के बाहर खड़े पेड़ की और संकेत किया –‘शायद पेड़ जितना ऊंचा, क्योंकि कई बार चांद पेड़ की डालियों में अटका हुआ दिखाई देता है.’

विदूषक बोला-‘आज रात मैं पेड़ पर चढ़ जाऊंगा और डालियों में अटके चांद को उतार कर आपके पास ले आऊँगा. हाँ, यह तो बताइए, चांद किस धातु का बना हुआ है?’

‘सोने का बना है चाँद,’ लीनोर ने कहा.

विदूषक अगले दिन एक सुनार के पास गया. और उसे सोने का छोटा-सा गोल चांदबनाने को कहा. सोने का चांदबन जाने.के बाद उसमे सोने की जंजीर पिरो दी गई. फिर उसने सोने का बना  नन्हा चांदराजकुमारी लीनोर को दे दिया. उसने चेन से लटकता नन्हा चांद गले में पहन लिया. वह बहुत खुश थी. उसे जो चाहिए था मिल गया था.

राजा ने विदूषक को इनाम दिया. समस्या हल हो गई थी. लेकिन शायद नहीं. राजा को पता था कि रात को जब चांद आकाश में चमकेगा तो राजकुमारी समझ जाएगी कि उसके गले में पड़ा सोने का चांद नकली है और वह फिर से बीमार हो जायेगी.

राजा ने मंत्री से उपाय पूछा तो वह बोला-‘हमें राजकुमारी के लिए काले शीशे वाले चश्मे बनवाने चाहिए. आप उनसे कह सकते हैं की रात को काले शीशे वाले चश्मे पहनना आँखों के लिए अच्छा रहेगा.’

‘मूर्ख! राजा गुर्राया. अगर वह रात को काले शीशे वाला चश्मा पहनेगी तो हो सकता है किसी चीज से टकराकर घायल हो जाए. यह ठीक नहीं है.

अब बुद्धिमान दरबारी की बारी थी. उसने सुझाव दिया-‘महाराज, हमें राजकुमारी की खिड़की के सामने वाले पेड़ों और झाड़ियों को काले तम्बू से ढँक देना चाहिए ताकि राजकुमारी जी आकाश में चांदकी और देख ही न सकें.’

ऐसे बेढंगे सुझाव पर राजा को क्रोध आना ही थी. फिर एक और बुद्धिमान’’ को बुलाया गया. उसने कहा –‘महाराज, हमें हर रात राजकुमारी जी की खिड़की के सामने रंगबिरंगी आतिशवाजी करनी चाहिए. आतिशबाजी की चमक और धुंए में वह चांद को ठीक से देख ही नहीं पाएगी और इस तरह समस्या हल हो जाएगी.’

‘मूर्ख! आतिशबाजी की आवाज, चमक और धुंए से राजकुमारी सो नहीं पाएगी और ज्यादा बीमार हो  जाएगी.’

आखिर राजा ने फिर से विदूषक को बुला भेजा, क्योंकि आकाश  में चांद दिखाई देने लगा था. विदूषक ने कहा-‘अगर हमारे बुद्धिमान दरबारी चांद को छिपाने का तरीका नहीं ढूंढ सके तो इसका मतलब एक ही है कि चांद को छिपाया नहीं जा सकता. हमें राजकुमारी से पूछना चाहिए.

विदूषक राजा की आज्ञा से राजकुमारी के कमरे में जा पहुंचा. राजकुमारी आकाश में चमकते चांद को देख रही थी. कई बार उसने सोने के चांद को आँख के सामने  लगाकर आकाश में देखा

विदूषक ने कुछ सोचा फिर राजकुमारी से बोला-‘एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है.’

‘क्या बात?’ राजकुमारी ने पूछा.

‘यही कि सोने का चांदतो आपके गले में लटक रहा है, फिर आकाश में यह दूसरा चांद कहां से आ गया?’

राजकुमारी हंसकर बोली – ‘अरे वाह, इतनी छोटी बात भी तुम्हारी समझ में नहीं आई देखो, जब मेरा कोई दांत टूटता है तो उसके जगह नया दांत आप से आप निकल आता है. जब माली बाग़ में फूल तोड़ता है तो उसके जगह न्य फूल उग आता है. उसे तरह जब तुम आकाश का चांद धरती पर ले आये तो उसकी जगह दूर नया चांद उग आया है. इस समय वही नया चांद आकाश में चमक रहा है.’

समस्या हल हो गई थी. अब कोई डर नहीं था. आकाश का पुराना चांद राजकुमारी लीनोर के गले में जंजीर से लटक रहा था और उसकी जगह आकाश में नया चांद उग आया था. वह चम-चम चमक रहा था.

राजकुमारी शांत भाव से सो रही थी.#

Wednesday, April 8, 2020

पारकर फिलमोर की कहानी : कौन थी परी?

विश्व बाल साहित्य में आज पढ़िए 
पारकर फिलमोर की कहानी : कौन थी परी?
हिंदी रूपांतर :देवेन्द्र कुमार + रमेश तैलंग 

(पारकर फिलमोर विश्व  के प्रसिद्ध  परी-कथा लेखकों में से एक थे. उन्होंने अनेक परीकथाओं का  संकलन/संपादन/पुनर्लेखन किया.उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों के नाम हैं : चेक्स्लोवाक फेयरी टेल्स, द हिकरी लिंब,द लाफिंग प्रिंस, माइटी मिक्को, द ढूमेकर्स एप्रन (चेक लोककथाओं की  दूसरी पुस्तक).

कौन थी परी?

जेन अपनी मां के साथ एक टूटी-फूटी झोपडी में रहती थी. पिता बहुत पहले नौकरी कि तलाश में परदेस गए थे. शुरू-शुरू में उनका समाचार आता रहा कि वह जल्दी हे घर लौट आएँगे, पर ऐसा कभी न हुआ. धीरे-धीरे कई वर्ष बीत गए. अब झोंपडी में जेन कि मां और वह, बस दो ही जने रह गए थे.

परिवार पहले ही गरीब था, अब स्थिति और भी बिगड़ गई. जेन कि मां गांव के कई घरों में मेहनत करती थी, तब कहीं जाकर मां-बेटी को रूखा-सूखा भोजन मिल पाता था.
एक बार जेन कि मां ठण्ड के मौसम में बीमार हो गई. इस कारण वह कई दिन तक काम पर नहीं जा सकि. काम पर नहीं गई तो भोजन कैसे मिलता. जेन बड़ी हो रही थी, पर वह इतनी भी बड़ी नहीं हुई थी कि अपनी मां कि जगह जाकर गांववालों के घरों में काम-काज कर सकती. धीरे-धीरे जेन कि मां कि तबीयत तो ठीक हो गई, पर वह इतनी कमजोर हो गई थी कि अब मेहनत-मजूरी नहीं कर सकती थी.
गांव का वैद्य उसका इलाज करता था. इलाज के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए दवाएं और अच्छा पौष्टिक भोजन न मिलने से स्वास्थ्य सुधर नहीं रहा था. अब वह चलने-फिरने से भी लाचार हो गई थी. आखिर गांव के कुछ लोग मिलकर उसका हालचाल पूछने आए. तय हुआ कि जेन जमींदार की भेड़-बकरियों को लेकर चरागाह में जाया करेगी. इसके बदले में जमीदार ने मां बेटी के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी. जीवन जैसे-तैसे चलने लगा. जेन छोटी होकर भी जैसे बड़ी हो गई थी.
शुरू-शुरू में मां उसे अकेली चरागाह में भेजने से डरती थी, पर दूसरा उपाय भी क्या था. वह जैसे-तैसे भेड़-बकरियों को चरागाह लाने-ले जाने लगी. घर से चलते समय मां जेन को दो सूखी रोटियां दे देती. जेन चरागाह में चली जाती और सारा दिन वहीं रहती. धीरे-धीरे उसका डर जाता रहा. चरागाह का वातावरण बहुत अच्छा था. हर तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ तथा तरह-तरह के फूल थे. भेड़-बकरियां आराम से चरती रहतीं. जेन इधर-उधर घूमती. एक दिन वह पेड़ के नीचे बैठी थी, तभी दूर झाड़ियों के पीछे गाने की आवाज आई. जेन को उत्सुकता हुई कि जाकर देखे कि झाड़ियों के पीछे कौन गा रहा है. गांव तो वहां से दूर था. इससे पहले उसने चरागाह में किसी को गाते हुए नहीं सुना था. तब इसका क्या रहस्य था.
जेन ने एक एक बार भेड़-बकरियों पर नजर डाली. वे आराम से चर रही थीं. उनकी तरफ से निश्चिन्त होकर जेन उन झाड़ियों की तरफ चल दी जहां से गाने की आवाज सुनाई दे रही थी. वह धीरे-धीरे झाड़ियों के पास जा पहुँची, और जो देखा तो देखती रह गई. झाड़ियों के पीछे एक छोटा-सा मैदान था. वहीं एक सुंदर लडकी मस्त होकर नाच रही थी. उसके सुनहरी केश हवा में लहरा रहे थे . उसके वस्त्र हवा में फहरते हुए धूप में चमचमा रहे थे. ऐसे सुंदर वस्त्र तो जेन ने इससे पहले कभी नहीं देखे थे . और उस लडकी का तो कहना ही क्या. मां जेन को सुंदर कहती थी. और सच में जेन-सी सुंदर लडकी पूरे गांव में कोई दूसरी नहीं थी, पर जेन को लगा चरागाह में नाचती लडकी उससे भी कहीं ज्यादा सुंदर थी. पर वह थी कौन और कहां से आई थी.
जेन के इन प्रश्नों का उत्तर कौन देता. वह लडकी बहुत अच्छा नाच रही थी. साथ ही मीठे स्वरों में कुछ गा भी रही थी. गाना जेन को सुनाई तो दे रहा था पर उसका अर्थ समझ में नहीं आ रहा था. जेन तन्मय हो कर उस अनजान लडकी का नृत्य देखती रही. उसे पता ही न चला कि कितना समय बीत गया. तभी उस लडकी ने नाचना बंद कर दिया. सब तरफ सन्नाटा छ गया. अब जेन का ध्यान आकाश की और गया –“अरे, उसे पता ही न चला कि कब दिन ढल गया था. अब तो वह बहुत घबरा गयी, फिर जल्दी-जल्दी –भेड़-बकरियों को इकठ्ठा किया और गांव की तरफ चल दी.
सोच रही थी कि आज पता नहीं मां क्या कहेगी. कितना फटकारेगी. देखा, मां घर के दरवाजे पर खडी उसकी राह देख रही थी. जेन को आते देख मां ने भागकर उसे अपनी बाहों में भर लिया. सर को थपथपा कर बोली –“आज देर कैसे हो गई?” जेन ने सोचा कि मां को सच बात बताएं या न बताए. पर फिर बता ही दिया.
सुनकर मां के चेहरे पर चिंता कि रेखाएं उभर आईं. उसने कहा-“बेटी, जंगलों में न जाने कौन रहता है. कहते हैं, वहां परियां, बौने, राक्षस रहते हैं. अब मैं तुझे नहीं जाने दूंगी.”
दिन निकला. जेन भेड़-बकरियों को चरागाह में ले जाने के लिए तैयार होने लगी. तभी मां ने कहा-“जेन, आज चरागाह में मत जाना.”
“क्यों?”
“मैंने कहा था न जंगलों में परियां, बौने होते हैं. दिन में वे छिपकर रहते हैं, पर कभी-कभी किसी को दिखाई भी पड़ जाए. पर फिर उस अनजान लडकी का चेहरा आंखों के सामने तैर गया. वह उम्र में जेन से थोड़ी बड़ी हैं. वे बहला फुसला कर किसी को भी अपने साथ ले जाते हैं और फिर उसका कुछ पता नहीं चलता. मैंने सुना है हमारे गांव के कई लोग इसी तरह गायब हो गए. मुझे तो लगता है तेरे पिताजी को भी परियां-बौने अपने साथ ले गए हैं. तभी उनकी कोई खबर हमें नहीं मिली.” कहकर जेन कि मां आंसू पोंछने लगी.
मां की बात सुनकर जेन को भी डर लगने लगा. पर फिर उस अनजान लडकी का चेहरा आंखों के सामने तैर गया. वह उम्र में जेन से थोड़ी बड़ी होगी. उसने कहा-“मां, अगर हम ऐसे डरकर रहेंगे तो कैसे चलेगा. तुम्हीं तो मुझे समझाया करती हो कि हमें किसी से डरना नहीं चाहिए.” फिर उसने हाथ में छडी उठा ली जिससे वह भेड़-बकरियों को हांका करती थी. बोली-“तुमने एक बार परी की कहानी सुनाई थी जिसके पास जादू कि छड़ी होती है. तो मेरे पास भी यह छड़ी है. अगर उसने मेरे साथ कोई गडबड कि तो मैं इसी चडी से उसे पीटूंगी. तुम जरा भी मत घबराओ.”
जेन की भोली बातें सुनकर मां के चिंतित चेहरे पर हंसी झलकने लगी. बोली-“काश मैं भी तेरे साथ चल सकती.”
जेन ने कहा- “मां, तुम जरा भी चिंता मत करो. अगर वह अच्छी परी है तो जरूर हमारे लिए कुछ अच्छा होगा. मैं उससे कहूंगी कि पिताजी को खोजकर ले आए.”
जेन की मां का चेहरा फिर उदास हो गया. बोली –“कौन जाने तेरे पिता कहां हैं. मां को समझाबुझाकर जेन भेड़-बकरियों को लेकर चरागाह की तरफ चल दी. वह सारा दिन उस लडकी की प्रतीक्षा करती रही, पर वह न आई. जेन बार-बार झाड़ियो के पीछे वाले मैदान की ऑर देखती पर वहां कोई न आया. आखिर दिन ढलने लगा तो जेन ने भेड़-बकरियों को इकठ्ठा किया और गांव की तरफ चल दी. वह सोच रही थी- “वह लडकी आज क्यों नहीं आई? क्या सचमुच वह कोई परी है. और उसे अपने जादू से पता चल गया कि हम उसके बारे में क्या सोचते हैं.”
उस रात भी जेन को नींद नहीं आई. वह लगातार उसी लडकी के बारे में सोचती रही जिसे मां परी कह रही थी. अगले दिन जेन फिर चरागाह में जा पहुँची. मौसम अच्छा था, धीमी हवा में फूल अपने सर हिला रहे थे. हवा में सुगंध फ़ैली थी, पर जेन उदास थी.
तभी वह चौंक पडी. हां, उसके कानों में गाने की आवाज आई थी. वह भागकर झाड़ियों के पास जा पहुंची. देखा, वही लडकी मस्ती से नाच रही थी –हवा में एक मीठी धुन तैर रही थी. जेन ज्यादा देर तक छिपी न रह सकी . धीरे-धीरे उसके तरफ बढ़ने लगी.
जेन को अपनी तरफ आती देख उस लडकी ने नाचना बंद कर दिया और ध्यान से जेन की तरफ देखने लगी. फिर मुस्करा कर बोली –“कौन हो तुम?”
“मेरा नाम जेन है, तुम कौन हो?”
“मेरा नाम परी है.” उस लडकी ने कहा. बोली –“आओ मेरे साथ नृत्य करो.” और उसने फिर से नाचना शुरू कर दिया. “परी” शब्द सुनकर जेन चौंक पडी. फिर उसके पैर जैसे आप से आप थिरकने लगे . उसने भी नाचना शुरू कर दिया.
परी नाम वाली लडकी ने अपना नृत्य रोक दिया और जेन को नाचते हुए देखने लगी. कुछ देर बाद उसने कहा-“तुम तो बहुत अच्छा नाचती हो.” इस पर जेन ने भी नृत्य रोक दिया और परी से बोली “क्या तुम सचमुच परी हो?”
परी हंस पडी. उसने कहा –“मेरे पिताजी मुझे इसी नाम से पुकारते हैं.”
“क्या परियों के माता-पिता भी होते हैं?”-जेन ने पूछा.
“हां, होते हैं.” परी ने कहा.
“तुम कल क्यों नहीं आई?”, जेन ने पूछा.
“क्योंकि कल मेरे पिताजी यहां नहीं आए थे आज वह जडी-बूटियाँ लेने आए हैं तो मैं भी चली आई. मैं उन्ही के साथ आती हूँ.”, परी ने कहा.
तभी दूर से एक दाढीवाला कंधे पर झोला लटकाए आता दिखाई दिया. जेन उसकी तरफ देखती हुई सोच रही थी. “क्या परियों के पिता हम जैसे होते हैं. यह तो हमारे गांववालों जैसा है.
दाढी वाला पास आया तो परी ने उसे जेन के बारे में बताया. कहा –“यह लडकी यहाँ भेड़-बकरियां चराती है.”
दाढी वाला कुछ पल जेन को घूरता रहा, फिर बोला –“घर में पिता भाई कोई नहीं, और तुम्हारी मां बीमार है.”
उसकी बातों ने जेन को चौंका दिया. सोचने लगी-“आखिर इसे कैसे पता कि मेरी मां बीमार है और घर में पिता तथा भाई कोई नहीं है. क्या यह जादू जानता है.”
तभी दाढी वाले ने कहा –“जेन, आज तो देर हो गई है. कल मैं तुम्हारी मां को देखने चलूँगा. मैं एक वैद्य हूं, शायद उनका इलाज कर सकूं.
इसके बाद परी और उसका पिता चले गए. जेन भी भेड़-बकरियों को लेकर गांव चली गई. घर पर मां उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी. उसने पूछा – “ परी मिली थी?”
“हां, मा, आज तो परी का पिता भी साथ था, मुझे लगता है, वह् जादू जानता है. उसने मुझे देखते ही जो कुछ कहा उससे तो ऐसे ही लगता है.” फिर उसने मां को पूरी बात बता दी. मां ने कहा _”जेन, मैं तो पहले ही कह रही थी कि वह लडकी जरूर एक परी है. उसके पिता ने तुझसे बिना पूछे ही हमारे बारे में सब कुछ बता दिया. उससे तो यही प्रमाणित होता है.”
उसी पूरी रात जेन और उसकि मां आपस में “परी” के बारे में बातें करते रहे. अगले दिन जेन समय से पहले ही चरागाह जाने के लिए तैयार हो गई. मां ने कहा –“जेन, अभी तो सूरज भी पूरी तरह नहीं उगा है. ऐसी हड़बड़ी क्यों?”
जेन ने कहा –“मां, परी के पिता ने कहा था न आज वह हमारे घर आएगा. देखो क्या होता है.” मां के रोकते-रोकते भी जेन काफी पहले चरागाह पहुँच गई. कुछ देर बाद उसने देखा परी और दाढी वाला चले आ रहे हैं.
दाढी वाले ने कहा –“जेन, मैं पहले कुछ जडी-बूटिया इकठ्ठी करूंगा, फिर मैं और परी तुम्हारे घर चलेंगे.” उसके जाने के बाद परी और जेन साथ-साथ नाचती रही. कुछ समय बाद परी का पिता अपने झोले में जडी-बूटियाँ लेकर आ गया. जेन ने भेड़-बकरियों को इकठ्ठा किया और तीनों गांव की और चल दी. जेन के मन में तरह-तरह के विचार आ जा रहे थे
जेन की मां दरवाजे पर खडी प्रतीक्षा कर रही थी. उन्होंने बड़े आदरपूर्वक परी और उसके पिता का स्वागत किया, फिर उदास स्वर में बोली –“घर में आप लोगों के स्वागत के लिए कुछ है नहीं. क्योंकि इसके पिता न जाने कहां चले गए और इसका कोई भाई भी नहीं है.”
परी के पिता ने कहा- “ यह बात तो मैं जेन को चरागाह में देखकर ही समझ गया था. अगर घर में इसके पिता या भाई होते तो इस छोटी ही लडकी को चरागाह में भेड़-बकरियां चराने के लिए क्यों आना पड़ता. अगर आप स्वस्थ होतीं तो जेन को अकेली चरागाह में कभी नहीं भेजतीं. इसी से मैंने जेन से आपके बीमार होने के बारे में कहा था.
इसके बाद परी के पिता ने जेन की मां कि खूब अच्छी तरह जांच की, फिर उन्हें कुछ दवाइयां दिलाईं, फिर कहा –“अब मैं एक हफ्ते बाद आपको देखने आऊँगा. मैं देखना चाहता हूँ कि मेरी दवाइयां आप पर कितना असर करती हैं.”
तभी जेन पूछ बैठी –“आपने अपनी बेटी का नाम परी रखा है. क्या आप सचमुच परीलोक से आए हैं?”
सुनकर परी और उसका पिता हंस पड़े. उन्होंने कहा –“यही समझ लो. मैं एक हफ्ते बाद फिर आऊंगा.”
“परी को भी साथ में जरूर लाना.” जेन ने कहा.
इसके बाद परी और उसका पिता चले गए. परी के पिता ने जेन की मां को जो दवाईयां खिलाई थीं उनका अच्छा प्रभाव हुआ. उनका स्वास्थय सुधरने लगा. एक सप्ताह बाद परी और उसके पिता फिर आए. उन्होंने जेन की मां को नई दवाएं खिलाई और कहा-“आप जल्दी ही एकदम स्वस्थ हो जाएंगी.” वे लोग अपने साथ एक बड़ी टोकरी में फल तथा भोजन की दूसरी सामग्री लाए थे.
यह देखकर जेन की मां ने कहा –“आप इतनी सारी चीजें ले आए हैं, पर मैं तो बदले में कुछ नहीं दे सकती.”
यह सुनकर परी उनसे लिपट गई. उसने कहा –“मैं आपको मौसी कहूंगी.” फिर परी और जेन मिलकर नाचने लगीं. देखकर जेन की मां की आँखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा-“आज मैं बहुत खुश हूँ.”
कुछ देर बाद परी और उसके पिता फिर आने की बात कहकर चले गए.जेन और उसकी मां दरवाजे पर खड़े उन्हें जाते हुए देखते रहे. उसके बाद परी और उसके पिता कभी नहीं आए. हां, हर हफ्ते उन्हें घर के दरवाजे पर फलों के टोकरा और दवाओं की थैली रखी मिलती थी. साथ में एक पत्र होता था-

“मेरी प्यारी मौसी,
आशा है अब आपका स्वास्थ्य पहले से ठीक होगा. हम जल्दी ही आपसे मिलने आएंगे. मैं और जेन मिलकर चरागाह में नृत्य करेंगे. तब तक आप भी इतनी स्वस्थ हो जाएंगी कि चरागाह में आकर हम दोनों को नाचते हुए देख सकें.
आपकी ,
परी!”
इसी तरह समय बीतता रहा, परी और उस उसके पिता कभी नहीं आए. जेन चरागाह में जाकर परी की प्रतीक्षा करती थी, पर परी से मिलने कि उसके इच्छा पूरी न हुई. जेन की मां का स्वास्थ्य एकदम ठीक हो गया. अब उन्हें गांव के घरों में मेहनत की जरूरत नहीं थी. अपनी झोंपडी के पिछवाड़े उन्होंने साग-सब्जियां उगानी शुरू कर दीं. उसी से घर का काम चल जाता था. अब जेन भेड़-बकरियां चराने चरागाह नहीं जाती थीं. पर कभी-कभी परी से मिलने की आशा लेकर वहां जाती जरूर थी. जेन और उसकी मां को एक प्रश्न का उत्तर कभी नहीं मिला –“क्या परी और उसका पिता सचमुच परी लोक से आए थे? कौन जाने? #

Tuesday, April 7, 2020

बाल कहानी - डबल ड्यूटी


देवेन्द्र कुमार

1940 में दिल्ली में जन्मे  देवेन्द्र कुमार पेशे से लेखक, पत्रकार और अनुवादक सभी कुछ  हैं. उन्होंने बड़ों और बच्‍चों के लिए कहानी, कविता, उपन्‍यास आदि सभी विधाओं में बड़ी मात्रा में लिखा है . 27 वर्षों तक  वे बच्चों की श्रेष्‍ठ पत्रिका ‘नंदन’ से जुडे़ रहे हैं । सैकड़ों बाल कहानियों/कविताओं के अलावा विश्‍व साहित्य की लगभग 300 श्रेष्‍ठ पुस्तकों का उन्होंने सार संक्षेप किया है । उनकी बाल कहानियों के अधिकांश पात्र निम्न वंचित वर्ग से आते हैं.  सम्प्रति वे स्वतंत्र लेखन करते  हैं..

आज यहाँ  प्रस्तुत है उनकी बाल कहानी - डबल ड्यूटी                 

लखमा तेजी से हाथ चला रही है. आज उसे जल्दी घर जाना है. कोई  मेहमान आने वाला हैं. लेकिन काम तो पूरा करना ही है. लखमा बाज़ार में तीन दुकानों में सफाई का काम करती है. पति मजदूर है. दोनों के काम करने पर भी घर मुश्किल से चलता है. एक बेटा है अमर.
दुकानों के बाहर बरामदे में पोंछा लगाते हुए लखमा की नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो कुछ आगे एक दुकान के बाहर सफाई कर रहा था. लखमा देखती रही. बच्चा सात आठ साल का लग रहा था. वह उसे देखती रही. बच्चा कोशिश कर रहा था पर सफाई उससे हो नहीं रही थी. पानी की बाल्टी खिसकाते हुए वह फिसल गया और बाल्टी उलट गई. अब लखमा रुक न सकी. उसने बढ़ कर बच्चे को गोदी में उठा लिया और सिर सहलाते हुए बोली-‘’ तेरा नाम क्या है?’’
‘’ जानी.’’ उसने कहा.
‘’ तू यह काम क्यों कर रहा है? यह तेरे बस का नहीं है. ‘’ पूछने पर लखमा ने जान लिया कि जानी की माँ रेशमा बीमार है. वह भी लखमा की तरह दुकानों में सफाई का काम करती है. और उसने ही जानी को सफाई करने भेजा था. ऐसी स्थिति से कई बार लखमा को भी गुजरना पड़ा था. वह जानती थी कि ऐसे में काम हाथ से निकल जाता है. इसीलिए जानी की माँ ने बेटे को काम करने भेजा होगा.
लखमा ने जानी से कहा-‘’ बेटा, तू रहने दे. जा बच्चों के संग खेल. मैं अभी निपटा देती हूँ. ‘’ जानी हंसने लगा और सडक पर खेलते बच्चों के बीच चला गया. हालांकि लखमा को घर जाने की जल्दी थी, पर उसे जानी का अधूरा काम पूरा करना ही था. उसने जल्दी जल्दी काम निपटाया फिर घर की तरफ चल दी. उसने देखा जानी सड़क पर दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा था, लखमा के होठों पर मुस्कान आ गई. उसे अच्छा लग रहा था. पर घर पहुँच कर मूड बिगड़ गया, उसे घर लौटने में देर हो गई थी. इसलिए मेहमान बिना मिले चला गया था.
अगली सुबह लखमा काम पर पहुंची तो जानी फिर वहाँ दिखाई दिया. इसका मतलब था कि जानी की माँ अभी बीमार थी. ‘ मुझे न जाने कितने दिन डबल ड्यूटी करनी होगी.’ वह यह सोच कर पछता रही थी कि उसने क्यों यह मुसीबत अपने ऊपर ले ली. वह जानी को सफाई करते देखती रही. वह ठीक तरह से काम कर नहीं पा रहा था. पर लखमा ने उसकी मदद नहीं की. लेकिन पोंछा लगाते हुए जब जानी दो बार फिसल गया तो लखमा रह न सकी. उसने जानी का हाथ पकड़ कर जोर से अपनी ओर खींचा और चिल्ला कर बोली--‘’ कल तुझे मना किया था न कि तू यह काम नहीं कर सकता. बता फिर क्यों आया ?’’
हाथ खींचने से जानी रो पड़ा. सुबकते हुए बोला--‘’ माँ ने भेजा है. उनकी तबीयत ठीक जो नहीं है.’’
‘’ चल मैं चलती हूँ तेरी माँ के पास, चाहे जो हो बस तुझे यहाँ नहीं आना है.’’ लखमा ने कहा और जानी के साथ उसकी माँ से मिलने चल दी. उसने जानी का काम अधूरा छोड़ दिया.वह   कुछ सोच रही थी.
जानी की माँ रेशमा छोटे से कमरे में जानी के साथ रहती थी. उसका पति दूसरे शहर में नौकरी करता था ओर कभी कभी ही यहाँ आया करता था. बीमारी में जानी की माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. लखमा जानी की माँ को देख कर समझ गई कि उसकी तबीयत जल्दी ठीक नहीं होगी. उसने कहा –‘’ जानी की माँ , तुम काम की चिंता मत करो. पर जानी को मत भेजा करो. अभी तो इसके पढने –- खेलने के दिन हैं. ‘’ जानी की माँ रेशमा ने कोई जवाब नहीं दिया,
अगली सुबह लखमा ने देखा कि जानी फिर वहां खड़ा था. लखमा को देखकर वह दूर चला गया, शायद जानी लखमा से डर गया था. लखमा उस दुकान वाले के पास गई जहाँ जानी सफाई कर रहा था. उसने कहा-‘’ जानी की माँ तो बीमार है. शायद वह काफी समय तक काम करने नहीं आ सकेगी ‘’ दुकान वाले ने कहा –- ‘’ तो तुम कर लो उसकी जगह. हमारी दो दुकानें और हैं.’’ लखमा खुश हो गई. उसे अच्छे पैसे मिलने की उम्मीद हो गई. डबल ड्यूटी में मेहनत  ज्यादा थी पर पगार भी तो दुगनी मिलने वाली थी. हाथों के साथ दिमाग भी भाग रहा था. वह सोच रही थी कि अतिरिक्त पैसों से क्या कुछ हो सकेगा. अब जानी दुकान पर नहीं आता था. बस एक चबूतरे पर बैठा लखमा को देखता रहता था. लखमा सोचती थी जानी यहाँ क्या कर रहा है. रेशमा के पास क्यों नहीं बना रहता. मन हुआ कि जानी से रेशमा का हाल पूछे पर चुप रह गई.
लखमा ने महीने के आखिरी सप्ताह में रेशमा के बदले काम किया था. दुकानवाले ने पैसे दिए तो बोली-‘’ रेशमा के पैसे भी दे दो, उसे जरुरत होगी.’’ दुकानवाले ने कहा-‘’ रेशमा के पैसे उसी को दूंगा.’’ सुन कर लखमा सोच में पड़ गई. वह रेशमा के बारे में सोच रही थी. एक तो काम नहीं ऊपर से बीमारी का खर्च. पिछले काम के पैसे भी नहीं मिल रहे हैं. बाज़ार में जानी दिखा तो पूछा-‘’ यहाँ क्या कर रहा है ? माँ के पास क्यों नहीं टिकता?’’
‘’ माँ ने काम खोजने को कहा है. ‘’ –- जानी बोला.
‘’ तुझे कौन काम देगा भला. ‘’ लखमा ने व्यंग्य से कहा. ‘’ चल मैं तेरी माँ से बात करती हूँ.’’ और उसके साथ रेशमा से मिलने चल दी. लखमा ने देखा कि रेशमा की तबीयत पहले से ज्यादा ख़राब है. साफ़ था कि उसे तुरंत काफी पैसे चाहिएं ताकि ठीक से दवा -- दारु और देख   भाल हो सके. लखमा ने कहा-‘’ तुम जानी को पढने भेजो न कि काम की तलाश में. ‘’
“मैं क्या करूँ?’’ –- रेशमा ने उदास स्वर में कहा
.’’सब ठीक हो जायेगा.अभी तुम मेरे साथ चलो.’’ कह कर लखमा उसे सहारा देती हुई दुकानदार के पास ले गई.
दुकानदार ने पैसे देते हुए लखमा से  कहा-‘’ तुम तो इसकी ऐसे सिफारिश कर रही हो जैसे तुम दोनों आपस में बहनें हों. लेकिन तुम दोनों के धर्म तो अलग अलग हैं, फिर बहनें कैसे हो सकती हो.’’ लखमा से पहले रेशमा बोल उठी-‘’ बहन होने के लिए  धर्म एक होना जरुरी नहीं.’’ और मुस्करा दी. लखमा सोच रही थी कि कहीं दुकानदार काम के बारे में उसकी बात रेशमा को न बता दे. तब तो रेशमा उसे लालची समझ बैठेगी. पर वैसा कुछ न हुआ. लखमा रेशमा को उसके घर ले आई. रास्ते भर वह कुछ सोचती रही थी. और फिर उसने फैसला कर लिया. रेशमा ने उसे अपनी बहन कहकर उसके मन को छू लिया था. लखमा को अपनी छोटी बहन याद आ गई जो गाँव में रहती थी. लखमा काफी समय से बहन से मिल नहीं पाई थी.
अगली सुबह काम पर जाने से पहले वह रेशमा के पास जा पहुंची. कहा-‘’ रेशमा, आराम कर, तेरा काम मैं संभाल लूंगी. पर एक शर्त है. आज के बाद जानी को काम पर कभी मत भेजना. उसे पढना चाहिए.‘’
‘’ कौन पढ़ाएगा जानी को?’’-- रेशमा ने उदास स्वर में कहा.
‘’मैं इसे मास्टरजी के पास ले जाऊँगी जो मेरे बेटे को पढ़ाते हैं. ‘’-- लखमा ने कहा. उसने आगे बताया कि मास्टरजी बच्चों को पढ़ाने के पैसे नहीं लेते. किताबें और कॉपी-- पेंसिल भी अपनी जेब से देते हैं. वे उन बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं जो स्कूल नहीं जा पाते.’’
रेशमा को लखमा की बात माननी पड़ी. लखमा जानी को मास्टरजी के पास ले गई. और जब जानी पहले दिन मास्टरजी से पढ़ कर आया तो वह ख़ुशी से रो पड़ी. लखमा रेशमा के बदले काम करती रही. महीना पूरा हुआ तो लखमा ने रेशमा की दुकानों के पैसे लाकर रेशमा के हाथ में रख दिए. वह लेने को तैयार नहीं हुई. तब लखमा ने कहा--‘’ मान ले कल अगर मैं बीमार हो जाऊं तो क्या तू मेरी मदद नहीं करेगी?’’ इस बात ने रेशमा को चुप कर दिया. अब कहने को कुछ नहीं था, लखमा अपने घर की ओर चली तो मन पर बैठा बोझ उतर गया था. ###                 







Monday, April 6, 2020

सपनों की शहज़ादी जंगल जलेबी



नासिरा शर्मा

अनेक शीर्ष पुरस्कारों से सम्मानित, वरिष्ठ कथालेखिका नासिरा शर्मा ने  हिंदी साहित्ठीय जगतको अनेक महत्वपूर्ण  कृतिया दी हैं  यथा - ठीकरे की मंगनी,पारिजात, मेरी प्रिय कहानियां, अजनबी जजीरा, पत्थर गली तथा औरत के लिए औरत. इन  कृतियों के अलावा  नासिरा जी ने बच्चों के लिए भी अनेक रोचक कहानियां लिखी हैं. उनकी कुछ बाल-कहानियों को इस ब्लॉग, तथा फेसबुक-समूह: world of children's literature, art & culture, पर श्रंखला बद्ध रूप में प्रकाशित करते हुए हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं. आशा है आप सभी बालसाहित्य प्रेमी इन कहानियों को पढ़ते हुए स्वयं भी आनंदित होंगे  और अपने माध्यम से बच्चों को भी इनका आनंद लेने का अवसर प्रदान करेंगे.  हमेशा की तरह आपकी प्रतिक्रियाओं का भी प्रतीक्षा रहेगी.

आज प्रस्तुत है  नासिरा  जी  की बाल कहानी -सपनों की शहज़ादी जंगल जलेबी


अनीस लगभग रोज़ ही सपने में माँ की सुनाई कहानी का वह वृक्ष देखता था जो
सड़क किनारे खड़े बिजली के खम्भों से भी ऊंचा था। बादलों तक पहुँच कर जैसे कि
आसमान से बातें करता हुआ हरदम झूमता रहता था। कभी कभार वह हवा से खेलने लगता
तो उसकी हरी-हरी टहनियाँ अपनी पत्तियों के बीच से गोल-गोल आकार के कुछ फल
गिरातीं जिन्हें वहां से गुज़रते बच्चे उठाकर खाते और एक दूसरे को देखकर खिलखिला
उठते थे। पेड़ पर बैठे बन्दर मुंह चलाते हुए एकाएक अपने दाँत निकाल उन पर खौखियाते,
फिर खाने में मस्त हो जाते। यही हाल गिलहरियों का भी था। हरदम इस फुनगी से झूलती
दूसरी फुनगी पर छलांग लगाती कुछ न कुछ कुतरती रहती थीं। माँ ने बताया था वह जंगल
जलेबी का पेड़ था। माँ किसी न किसी बहाने दिन में एक बार उसका नाम जरूर लेती थीं।
जैसे, ”अरे इस कपड़े का रंग बिल्कुल जंगल जलेबी जैसा है या फिर - लाल हरा रंग
साथ-साथ ठीक जंगल जलेबी की तरह मनभावन लगता है।“
अनीस को माँ की बातें सच्ची लगती थीं मगर उसका मन यह बात मानने को हरगिज़
तैयार न था कि सुनहरी रसीली जलेबियां हलवाई के थाल से उड़कर पेड़ की शाखों से
लटक जायेंगी और अपना रंग रूप बदल हरी लाल हो जायेंगी, भला कैसे? अम्माँ मुझे
बहलाती हैं क्या? कुछ दिनों बाद वह एक और सपना देखने लगा जैसे वह हलवाई की
दुकान पर खड़ा है और हलवाई सर पकड़े खाली थाल को घूर रहा है, जहाँ कढ़ाई से
निकली कुरकुरी जलेबियां शीरे में डूबी मचल रही हैं और जैसे ही शीरे से निकाल वह थाल
में डाली जाती हैं तुरन्त उछल कर वह उड़ने लगती हैं।
अनीस ने माँ से पूछा था, ”क्या आपने कभी जंगलजलेबी खाई है?“
”क्यों नहीं, उसका मीठा स्वाद मुझे भूले नहीं भूलता, आज भी खाने का मन करता
है। गाँव के घर से जब हम पाठशाला की ओर जाते थे तब रास्ते में एक पेड़ मिलता था।
सब उसे जंगलजलेबी के नाम से जानते थे। तब हमारे गाँव में कोई हलवाई नहीं था। एक
बार हम क़स्बे की तरफ मेला देखने गए थे तो मेरे बाबा ने गुड़ की जलेबी हम सब
भाई-बहनों को खिलाई थी। तब मेरे मन में यह विचार आया था कि देखो हलवाई ने हमारे
जंगलजलेबी पेड़ के फल की कैसी नक़ल उतारी है, ढेरों मीठा डाल कर।“ इतना कह माँ
खूब हँसी थीं।

अनीस का बालमन यह सब बातें सुनकर सोचने लगता कि ज़रूर हलवाई जंगल से
किसी दिन गुज़रा होगा। ज़मीन पर गिरी जंगलजलेबी को भूख के कारण चखा होगा और
गाँव आकर नक़ल कर बैठा होगा। उम्र बढ़ने के साथ उसके मन में जंगलजलेबी के वृक्ष को
देखने की इच्छा तीव्र होने लगी और उसे खाने की भी, मगर मुम्बई शहर में उस पेड़ को
ढूंढने कहाँ जाएं? एक दिन इसी खोजी सोच ने टीचर द्वारा सजा भी दिलवा दी। जब वह
वृक्षरोपण पाठ पढ़ रहा था तो एकाएक पुस्तक में छपी वृक्षों की तस्वीर में ऐसा खोया कि वह
घना वृक्ष हरे से सुनहरा हो गया और रसीली जलेबियों से भर गया। उससे टपकते शीरे की
बूँद को वह मुँह खोल अपनी ज़बान पर लेने के लिए बेचैन हो उठा, तभी तेज़ आवाज़ से
चौंक  पड़ा।
”अनीस! यह क्या कर रहे हो?“
अनीस ने पाया कि सारी कक्षा हँस रही थी और वह गर्दन ऊँची किए ज़बान निकाले
छत पर नज़र गड़ाए है, वह हड़बड़ा गया। ”पढ़ाई की तरफ ध्यान दो, कक्षा का अनुशासन
खराब मत करो।“ इस बार टीचर्स ने डेस्क पर स्केल मार कर कहा तो हँसते बच्चे सहम गए
और अनीस रुहांसा सा हो गया। अनीस के पास बैठे उसके मित्र ने देखा कि उसकी आँख
से आंसू टपक कर पेड़ के चित्र पर गिरा है। उसने कनखियों से मित्र को देखा और सोचने
लगा कि अनीस क्लास का मानीटर है। पढ़ने में अच्छा है। आज यह शरारत कैसे कर बैठा?
लंच के समय जब सारे बच्चे अनीस को चिढ़ाने लगे तो अमित ने अपना टिफिन
बाक्स खोलते हुए अनीस से पूछा, ”लंच में आज क्या लाए हो?“
”जंगल जलेबी!“ अचानक हाथ पर हाथ धरे अनीस खीज उठा। ‘जंगल जलेबी!’
अमित ने चैंक कर मित्र को देखा और ज़ोर-ज़ोर हँसने लगा, ”तू पागल हो गया है ... जंगल
जलेबी! दिखा तो ज़रा! यह जंगल जलेबी क्या चीज़ होती है।“ अमित ने अनीस के बैग से
टिफिन बाक्स निकालते हुए पूछा। उसकी आवाज़ जिनके कानों में पहुंची वह भी ‘जंगल
जलेबी’ की रट लगा हँसने लगे। उदास अनीस भी मुस्कुरा पड़ा। टिफिन बाक्स खुल चुका
था उसमें दो पराठों का रोल रखा हुआ था आम के अचार की फाँक के साथ। चीखते,
चिल्लाते हँसते बच्चे जो ‘जंगल जलेबी’ ‘जंगल जलेबी; दोहरा रहे थे एकाएक चुप हो गए।
सबने एक दूसरे की तरफ सवालिया नज़रों से देखा और अपनी-अपनी जगहों पर लौट गए
और लंच खाने में मस्त हो गए।

अमित ने अनीस के लंच बाक्स से पराठा उठाया और अपने लंच से सैंडविच उठाकर
उसके बाक्स में रखा। दोनों चुपचाप लंच खाने में व्यस्त हो गए। जब पानी पी चुके तो अनीस
ने हाथ धोते हुए कहा, ”अमित मैं इस ‘जंगल जलेबी’ के पेड़ को हर हालत में देखकर
रहूँगा।“ यह सुनकर अमित बोला, ”पेड़ तो देख ले, पेड़ देखने को मना किसने किया है?
”वह तो है मगर इस पेड़ का नाम कुछ फनी सा है। शायद मेरी मम्मी ने मुझे नई
कहानी सुनाने के लिए ऐसा मज़ेदार नाम रख लिया हो?“
”तो चलें गूगल पर सर्च कर लेते हैं।“ अमित ने कहा तो अनीस का चेहरा खिल उठा,
परन्तु दूसरे पल मुरझा गया।
”क्यों क्या हुआ?“ अमित ने ताज्जुब से पूछा:”कुछ नहीं।“ अनीस ने कहा फिर बैग
कन्धे पर डाल क्लासरूम की तरफ बढ़ा। घन्टी बज उठी थी। फील्ड में फैली विद्यार्थियों की
भीड़ छटने लगी थी।
”बाटिनी के किसी अध्यापक से पूछा जा सकता है ...“ मन ही मन अनीस ने कहा और
अपने को हल्का महसूस किया, मगर दूसरे लम्बे वह उलझन में पड़ गया। यदि सर नाम
सुनकर हंस पड़े और कोरी कल्पना कह बैठे या फिर वास्तव में ऐसा पेड़ मौजूद हो और
उसका नाम कुछ और हुआ तो ...? माँ की जंगल जलेबी’ का मज़ाक उड़े, यह मुझे अच्छा
नहीं लगेगा। मगर अम्माँ मुझे झूठमूठ की कहानी क्यों सुनाएंगी। उन्होंने उस फल को खाया
है। यदि खाया है तो फिर वह बेर, शहतूत, बेल, खिन्नी, फालसा या फिर अमरख व कैथे की
तरह बाज़ार में बिकता क्यों नहीं है। सोचते-सोचते वह बुदबुदा उठा - जंगल जलेबी!
जंगल जलेबी! मेरी सपनों की शहज़ादी, जंगल जलेबी! कहते-कहते अनीस के चेहरे पर
मुस्कान फैल गई।

रात को खाने की मेज़ पर अनीस के पापा ने अपनी पत्नी से पूछा, ”कामनी! अगले
माह से अनीस और अरमान की छुट्टियाँ होने वाली हैं। मैं भी छुट्टी की अर्ज़ी दे चुका हूँ, तुमने
कुछ सोचा है कि कहाँ घूमने जाना है?“
”अम्माँ के गाँव।“ जल्दी से अनीस बोल उठा।
”मेरे गाँव?“ माँ चैंक पड़ी।
”वह भी इस गर्मी में?“ पापा हंस पड़े।
”मैं तो वाटर पार्क रिसाॅर्ट जाऊँगा। आपने वायदा किया था।“ अरमान ने रूठ कर
हाथ में पकड़ा कौर प्लेट में पटख दिया और हाथ सीने पर बांध कुर्सी की पीठ से कमर टिका
ली।
”अरे अभी हम सलाह मशविरा कर रहे हैं, इसमें रूठने वाली कौन-सी बात है।“ माँ
ने हैरत से बेटे को देखा।
”अरमान! तुम्हारी मम्मी ठीक कह रही हैं पहले खाना खाओ।“ इतना कह पापा ने
अरमान की प्लेट उसके आगे सरकाई। सब खामोशी से खाना खाने लगे।
अनीस खाना खाने के बाद पढ़ने बैठ गया। होमवर्क पूरा कर उसने किताबें समेटी,
लैम्प बुझाया और करवट बदल सोने की तैयारी करने लगा। आँखों में नींद नहीं थी मगर
पढ़ने में भी दिल नहीं लग रहा था। उसका मन अनमना सा हो रहा था।
”अम्माँ ने बचपन में जाने कितनी कहानियाँ सुनाई थीं। जिनमें से कुछ याद हैं कुछ
भूल गया, मगर यह जंगल जलेबी वाली अम्माँ की यादें जैसे मेरी यादें बन चुकी हैं। बार-बार
एक ही सपना आता है और कहानी को नए सिरे से याद कराके चला जाता है। जब तक
मैं यह पेड़ ढूँढ कर खुद अपनी आँखों से नहीं देख लेता हूं। मैं गूगल से इसकी जानकारी
नहीं लूंगा क्योकि माँ की बातों पर जो मेरा अटल विश्वास है उसमें दरार नहीं पड़ने दूंगा।
यह सब सोचते-सोचते अनीस नींद में डूब गया। और फिर वही सपना सामने था। हरा भरा
पेड़ और उसकी छाया में नीचे पड़े फलों को चुनती एक लड़की ... लहँगा व चुन्नी पहने हुए
फल का स्वाद लेती हुई।



पापा आफिस के लिए तैयार हो चुके थे। नाश्ते की मेज़ पर जब वह पहुँचा तो वह
नाश्ता करके उठ रहे थे। हाथ धोते हुए उन्होंने उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा और बड़े प्यार
से कहा, ”देखो अनीस! अब तुम नवीं कक्षा में पहुंच चुके हो। पढ़ाई को अब सीरियसली लो
समझे बेटा!“
”जी पापा!“ इतना कह कर उसने टोस्ट पर जैम लगाया। माँ को नजर भर कर देखा
जो अरमान का स्कूल बैग में किताबें रख रही थीं। दिल चाहा कि उनसे कहे, ”अम्माँ! इस
बार गाँव ले चलो, चाहे दो ही दिन के लिए सही“ मगर ज़बान से कुछ बोला नहीं और
चुपचाप नाश्ता करने लगा। तभी पापा ने कार की चाबी उठाते हुए कहा, ‘अरे कामनी! मैं
तुम्हें बताना भूल गया कि तुम्हारे बड़े चाचा का मैसेज आया था। उनके छोटे बेटे की शादी
है और तुम्हें ख़ासतौर से बुलाया है। उन्हें फोन कर लो।“

”मैं गाँव नहीं जाऊँगा“ अरमान ने गुस्से से कहा।
”तुम्हें भेज कौन रहा है। सिर्फ तुम्हारी अम्माँ और अनीस जायेंगे क्योंकि उन्हीं दिनों
तुम्हारे बड़े अब्बा एलाज के लिए मुम्बई आ रहे हैं। उनके साथ तुम्हारी फूफी भी आ रही हैं।“
इतना कह कर उन्होंने अरमान का हाथ पकड़ा और दरवाज़े की तरफ बढ़े। उनके पीछे
अनीस भी चल पड़ा।

ट्रेन में बैठे वे दोनों जब गाँव की तरफ जा रहे थे तो भागते दृश्यों को देखते हुए
अचानक अनीस पूछ बैठा, ‘ए अम्माँ! हमको आप वह पेड़ दिखायेंगी न?’
”कौन-सा पेड़?“
”वही जंगल जलेबी वाला पेड़! जिसमें हरे सफेद से खुशबूदार फूल निकलते थे और
बाद में वह लाल-हरे, मीठे-कड़वे फल बन जाते थे। जिन्हें आप चाव से खाती थीं ... याद
आया अम्माँ।“
”मैं अपना बचपन कैसे भूल सकती हूँ पगले!“ माँ की आंखें तरल हो उठीं फिर हँस
कर बोली, ”तुझे कैसे याद रहा।“
”मेरे सपने में आता है कभी-कभी ...“ अनीस हँसा तो माँ ने उसे गौर से देखा और
धीमें से बोली, ‘मेरे भी।’
ट्रेन भाग रही थी। माँ सो गई वह भी ऊँघ गया।
अचानक शोर से आँख खुली। देखा सुबह के सूरज की लालिमा फूट चुकी थी। लोग
अपना सामान समेट रहे हैं और अम्माँ खिड़की से बाहर झाँक रही हैं। एकाएक चहक कर
बोली, ”अनीस, देखो ... देखो यह सारे पेड़ जंगल जलेबी के हैं। इस बार खूब कसके फला है।“
तभी पीछे से किसी ने कहा, ”अरे एका सिंगड़ी कहत है।“ यात्री ट्रेन से उतरने लगे।
उन दोनों को लेने आए रिश्तेदार सलाम करके सामान उठाने लगे। अनीस की नज़रें तो बस
पेड़ों पर जमीं थीं जिन पर चिड़ियों के झुँड के झुँड चहचहा रहे थे। छोटे से स्टेशन से बाहर
निकल कर सब रिक्शे पर बैठे तो अनीस बोला। ”अम्माँ अपना मोबाइल देना“ और इतना कह
उसने रिक्शे वाले को रुकने को कहा और रिक्शे से कूदा, फिर झटपट उन वृक्षों की कई
तस्वीरें खींची और दौड़ता हुआ जाकर पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। ऊपर से कई जंगल
जलेबियाँ एक साथ उसके सर व कन्धे पर गिरीं जिन्हें उसने झुक कर रूमाल में समेटा और
भागता हुआ रिक्शे पर चढ़ कर बोला, ”लो अम्माँ चखो ... साथ-साथ खाते हैं।“
झटपट उसने अमित को तस्वीरें भेजीं और जंगल जलेबी को खाते हुए माँ और अपनी
सेल्फी भी ली। अभी कुछ पल ही गुज़रे थे कि गूगूल से ली सूचना का लिंक अमित ने उसको
भेज दिया। लिखा था, ‘जंगल जलेबी का वृक्ष नेटिव मैकसिको व सेन्टंल अमेरिका, बंगलादेश,
श्रीलंका, सेंटंल उत्तर प्रदेश, फिलिपिन, फेलोरीडा व केरोबियन में भी पाया जाता है जिसकी
ऊँचाई 30-50 फुट के अन्दर होती है’ सूखे में भी यह उगता है! गुजरात में इसको गोरस
अम्बली, मराठी में फिरंगी चिन्च, बंगाल में जंगल जलेबी, अंगे्रजी में मद्रास थ्रान कहते हैं।
हिन्दुस्तानियों द्वारा 1960 में यह कुवैत ले जाया गया जहाँ इसको ‘शौकत थ्रान’ कहते हैं
मगर यह पेड़ मद्रास में नहीं पाया जाता है। इसका तना, पत्तियाँ, बीज सभी कुछ दवा बनाने
के काम में आते हैं।’ यह सब पढ़ते-पढ़ते अनीस हँस पड़ा और माँ को देखने लगा जिनके
चेहरे पर बचपन का खोया स्वाद पाने की खुशी झलक रही थी। जिसे देखकर वह मन ही
मन कह उठा।
”मेरी अम्माँ! किसी गूगूल से कम हैं क्या!“
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